औरंगाबादी उर्दू और वली दकनी के अदबी स्रोत
वली दकनी की ज़बान और शायरी अचानक वजूद में नहीं आई, बल्कि यह औरंगाबाद के ख़ास भाषाई माहौल और हसन शौक़ी जैसे उनसे पहले के शाइरों की देन थी।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
वली दकनी की ज़बान और शायरी अचानक वजूद में नहीं आई, बल्कि यह औरंगाबाद के ख़ास भाषाई माहौल और हसन शौक़ी जैसे उनसे पहले के शाइरों की देन थी।