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ज़र्बुल-मसल पर शेर

मैं भी बहुत अजीब हूँ इतना अजीब हूँ कि बस

ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं

जौन एलिया

उन के देखे से जो जाती है मुँह पर रौनक़

वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

Interpretation: Rekhta AI

प्रिय की मौजूदगी प्रेमी के चेहरे पर पल भर की रौनक ले आती है, जबकि भीतर की पीड़ा बनी रहती है। देखने वाले इस बाहरी चमक को सेहत का संकेत समझ लेते हैं और असली दुख नहीं देख पाते। शे’र प्रेम की ‘बीमारी’ और दिखने‑वाले हाल असली हाल के अंतर को मार्मिक ढंग से कहता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने

लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई

मुज़फ़्फ़र रज़्मी

बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब'

कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि उसकी स्व-विस्मृति या बेहोशी किसी असली वजह से है। “पर्दा-दारी” उस छुपे हुए सच, दर्द या प्रेम की ओर इशारा करती है जिसे वह खुलकर कह नहीं सकता। इसलिए बाहरी तौर पर जो उलझन दिखती है, वह भीतर की छिपी बात का असर है। यह शेर रहस्य और अंदरूनी बेचैनी का भाव देता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

ज़िंदगी ज़िंदा-दिली का है नाम

मुर्दा-दिल ख़ाक जिया करते हैं

इमाम बख़्श नासिख़

वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र था

वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

'उम्र सारी तो कटी 'इश्क़-ए-बुताँ में 'मोमिन'

आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में कवि अपने ही जीवन पर कड़ी आत्म-ग्लानि जताता है और अंत समय का डर दिखता है। “इश्क़-ए-बुताँ” दुनिया की सुंदरता और भटकाने वाली चाहतों का संकेत है, जो ईमान से दूर कर देती हैं। वह कहता है कि जब सारी उम्र गलत लगाव में गई, तो मौत के समय की आख़िरी तौबा किस काम की। भाव का केंद्र पछतावा और आत्म-व्यंग्य है।

मोमिन ख़ाँ मोमिन

इक और दरिया का सामना था 'मुनीर' मुझ को

मैं एक दरिया के पार उतरा तो मैं ने देखा

मुनीर नियाज़ी

दामन पे कोई छींट ख़ंजर पे कोई दाग़

तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो

कलीम आजिज़

अब उदास फिरते हो सर्दियों की शामों में

इस तरह तो होता है इस तरह के कामों में

शोएब बिन अज़ीज़

क़िस्मत तो देख टूटी है जा कर कहाँ कमंद

कुछ दूर अपने हाथ से जब बाम रह गया

क़ाएम चाँदपुरी

मैं ने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'

मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर हार मानने के साथ हल्का व्यंग्य भी रखता है: बोलने वाला स्वीकार करता है कि नतीजा “कुछ नहीं” है, फिर भी कहता है कि जब कुछ भी मुफ्त मिला हो तो उसे बुरा क्यों माना जाए। “मुफ्त हाथ लगना” किस्मत से बिना मेहनत/कीमत के मिलने वाली चीज़ का संकेत है। भाव यह है कि कमी को भी समझदारी और हँसी से सह लिया जाए।

मिर्ज़ा ग़ालिब

शिकस्त फ़त्ह मियाँ इत्तिफ़ाक़ है लेकिन

मुक़ाबला तो दिल-ए-ना-तवाँ ने ख़ूब किया

नवाब मोहम्मद यार ख़ाँ अमीर

बाग़बाँ ने आग दी जब आशियाने को मिरे

जिन पे तकिया था वही पत्ते हवा देने लगे

साक़िब लखनवी

मैं समझा आप आए कहीं से

पसीना पोछिए अपनी जबीं से

अनवर देहलवी

ये बज़्म-ए-मय है याँ कोताह-दस्ती में है महरूमी

जो बढ़ कर ख़ुद उठा ले हाथ में मीना उसी का है

शाद अज़ीमाबादी

इतनी बढ़ा पाकी-ए-दामाँ की हिकायत

दामन को ज़रा देख ज़रा बंद-ए-क़बा देख

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले

अपनी ख़ुशी आए अपनी ख़ुशी चले

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर इंसान की बेबसी और जीवन-मरण पर उसके वश होने की हकीकत बयां करता है। कवि कहते हैं कि जन्म और मृत्यु दोनों ही हमारे हाथ में नहीं हैं, हम तो बस नियति के खेल का हिस्सा हैं। आना हमारे वश में था और जाना हमारी मर्जी से हो रहा है, सब कुछ पहले से तय है।

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

गो क़यामत से पेशतर हुई

तुम आए तो क्या सहर हुई

मेला राम वफ़ा

चर्ख़ को कब ये सलीक़ा है सितमगारी में

कोई माशूक़ है इस पर्दा-ए-ज़ंगारी में

मन्नू लाल सफ़ा लखनवी
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