मैं भी बहुत अजीब हूँ इतना अजीब हूँ कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है
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प्रिय की मौजूदगी प्रेमी के चेहरे पर पल भर की रौनक ले आती है, जबकि भीतर की पीड़ा बनी रहती है। देखने वाले इस बाहरी चमक को सेहत का संकेत समझ लेते हैं और असली दुख नहीं देख पाते। शे’र प्रेम की ‘बीमारी’ और दिखने‑वाले हाल व असली हाल के अंतर को मार्मिक ढंग से कहता है।
ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई
बे-ख़ुदी बे-सबब नहीं 'ग़ालिब'
कुछ तो है जिस की पर्दा-दारी है
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कवि कहता है कि उसकी स्व-विस्मृति या बेहोशी किसी असली वजह से है। “पर्दा-दारी” उस छुपे हुए सच, दर्द या प्रेम की ओर इशारा करती है जिसे वह खुलकर कह नहीं सकता। इसलिए बाहरी तौर पर जो उलझन दिखती है, वह भीतर की छिपी बात का असर है। यह शेर रहस्य और अंदरूनी बेचैनी का भाव देता है।
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ज़िंदगी ज़िंदा-दिली का है नाम
मुर्दा-दिल ख़ाक जिया करते हैं
वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था
वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है
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'उम्र सारी तो कटी 'इश्क़-ए-बुताँ में 'मोमिन'
आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे
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इस शेर में कवि अपने ही जीवन पर कड़ी आत्म-ग्लानि जताता है और अंत समय का डर दिखता है। “इश्क़-ए-बुताँ” दुनिया की सुंदरता और भटकाने वाली चाहतों का संकेत है, जो ईमान से दूर कर देती हैं। वह कहता है कि जब सारी उम्र गलत लगाव में गई, तो मौत के समय की आख़िरी तौबा किस काम की। भाव का केंद्र पछतावा और आत्म-व्यंग्य है।
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इक और दरिया का सामना था 'मुनीर' मुझ को
मैं एक दरिया के पार उतरा तो मैं ने देखा
दामन पे कोई छींट न ख़ंजर पे कोई दाग़
तुम क़त्ल करो हो कि करामात करो हो
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अब उदास फिरते हो सर्दियों की शामों में
इस तरह तो होता है इस तरह के कामों में
क़िस्मत तो देख टूटी है जा कर कहाँ कमंद
कुछ दूर अपने हाथ से जब बाम रह गया
मैं ने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है
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यह शेर हार मानने के साथ हल्का व्यंग्य भी रखता है: बोलने वाला स्वीकार करता है कि नतीजा “कुछ नहीं” है, फिर भी कहता है कि जब कुछ भी मुफ्त मिला हो तो उसे बुरा क्यों माना जाए। “मुफ्त हाथ लगना” किस्मत से बिना मेहनत/कीमत के मिलने वाली चीज़ का संकेत है। भाव यह है कि कमी को भी समझदारी और हँसी से सह लिया जाए।
न मैं समझा न आप आए कहीं से
पसीना पोछिए अपनी जबीं से
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ये बज़्म-ए-मय है याँ कोताह-दस्ती में है महरूमी
जो बढ़ कर ख़ुद उठा ले हाथ में मीना उसी का है
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इतनी न बढ़ा पाकी-ए-दामाँ की हिकायत
दामन को ज़रा देख ज़रा बंद-ए-क़बा देख
लाई हयात आए क़ज़ा ले चली चले
अपनी ख़ुशी न आए न अपनी ख़ुशी चले
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यह शेर इंसान की बेबसी और जीवन-मरण पर उसके वश न होने की हकीकत बयां करता है। कवि कहते हैं कि जन्म और मृत्यु दोनों ही हमारे हाथ में नहीं हैं, हम तो बस नियति के खेल का हिस्सा हैं। न आना हमारे वश में था और न जाना हमारी मर्जी से हो रहा है, सब कुछ पहले से तय है।
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गो क़यामत से पेशतर न हुई
तुम न आए तो क्या सहर न हुई
चर्ख़ को कब ये सलीक़ा है सितमगारी में
कोई माशूक़ है इस पर्दा-ए-ज़ंगारी में