मातम न क्यों करूँ दिल-ए-साहिल-नसीब का
इस बहर-ए-ज़िंदगी में तलातुम हयात है
बचा सकेंगे न ये नग़्मा-हा-ए-चंग-ओ-रबाब
सिपर उठा कि तू मैदान-ए-कार-ज़ार में है
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
मातम न क्यों करूँ दिल-ए-साहिल-नसीब का
इस बहर-ए-ज़िंदगी में तलातुम हयात है
बचा सकेंगे न ये नग़्मा-हा-ए-चंग-ओ-रबाब
सिपर उठा कि तू मैदान-ए-कार-ज़ार में है