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तंज़-ओ-मिज़ाह पर शेर

तंज़-ओ-मिज़ाह की शायरी

बयक-वक़्त कई डाईमेंशन रखती है, इस में हंसने हंसाने और ज़िंदगी की तलख़ियों को क़हक़हे में उड़ाने की सकत भी होती है और मिज़ाह के पहलू में ज़िंदगी की ना-हमवारियों और इंसानों के ग़लत रवय्यों पर तंज और मिज़ाह के पैराए में एक तख़लीक़-कार वो सब कह जाता है जिस के इज़हार की आम ज़िंदगी में तवक़्क़ो भी नहीं की जा सकती। ये शायरी पढ़िए और ज़िंदगी के उन दिल-चस्प इलाक़ों की सैर कीजिए।

पैदा हुआ वकील तो शैतान ने कहा

लो आज हम भी साहिब-ए-औलाद हो गए

अकबर इलाहाबादी

मैं भी ग्रेजुएट हूँ तुम भी ग्रेजुएट

इल्मी मुबाहिसे हों ज़रा पास के लेट

अकबर इलाहाबादी

बी.ए भी पास हों मिले बी-बी भी दिल-पसंद

मेहनत की है वो बात ये क़िस्मत की बात है

अकबर इलाहाबादी

तिफ़्ल में बू आए क्या माँ बाप के अतवार की

दूध तो डिब्बे का है तालीम है सरकार की

अकबर इलाहाबादी

कोट और पतलून जब पहना तो मिस्टर बन गया

जब कोई तक़रीर की जलसे में लीडर बन गया

अकबर इलाहाबादी

बूढ़ों के साथ लोग कहाँ तक वफ़ा करें

बूढ़ों को भी जो मौत आए तो क्या करें

अकबर इलाहाबादी

डिनर से तुम को फ़ुर्सत कम यहाँ फ़ाक़े से कम ख़ाली

चलो बस हो चुका मिलना तुम ख़ाली हम ख़ाली

अकबर इलाहाबादी

रहमान के फ़रिश्ते गो हैं बहुत मुक़द्दस

शैतान ही की जानिब लेकिन मेजोरिटी है

अकबर इलाहाबादी

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