ख़िज़ाँ पर ग़ज़लें
ख़िज़ाँ शायरी में सिर्फ
एक लफ़्ज़ ही नहीं जिसे एक मौसम के बयान के लिए इस्तेमाल किया जाता हो बल्कि ज़िंदगी की तमाम-तर मन्फ़ी सूरतों का एक इस्तेआरा है। ये आशिक़ के मौसम-ए-हिज्र के लिए भी इस्तेमाल होता है और समाजी, सियासी-ओ-तहज़ीबी सतह पर फैले हुए तारीक सायों के इज़हारिये के तौर पर भी। इस लफ़्ज़ के हवाले से ये चंद इशारे हमने दिए हैं बाक़ी आप तलाश कीजिए। हमारा ये इन्तिख़ाब हाज़िर है।