इक रात वो गया था जहाँ बात रोक के
अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के
ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया
तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर अपने ही भरोसे पर पछतावा और आत्म-तिरस्कार दिखाता है। वादा पूरा न होने से इंतज़ार इतना भारी और लंबा लगता है कि उसे “क़यामत” जैसा कहा गया है। यहाँ क़यामत अंत-काल नहीं, बल्कि मन की घबराहट, टूटन और निराशा का रूपक है।
रात आ कर गुज़र भी जाती है
इक हमारी सहर नहीं होती
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जागता हूँ मैं एक अकेला दुनिया सोती है
कितनी वहशत हिज्र की लम्बी रात में होती है
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ज़िंदगी किस तरह कटेगी 'सैफ़'
रात कटती नज़र नहीं आती
दिन कटा जिस तरह कटा लेकिन
रात कटती नज़र नहीं आती
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रात काटे नहीं कटती है किसी सूरत से
दिन तो दुनिया के बखेड़ों में गुज़र जाता है
न पाया वक़्त ऐ ज़ाहिद कोई मैं ने इबादत का
शब-ए-हिज्राँ हुई आख़िर तो सुब्ह-ए-इंतिज़ार आई
शाम-ए-ग़म की सहर नहीं होती
या हमीं को ख़बर नहीं होती
ऐ 'ज़की' हिज्र की रातें नहीं काटे कटतीं
कोई अच्छी सी ग़ज़ल गाओ कि कुछ रात कटे
सर्द रात अपनी नहीं कटती कभी तेरे बग़ैर
ऐसे मौसम में तो और आग लगाती है हवा
ये लम्बी रात ये बे-ख़्वाबी ये करवट करवट बेताबी
मौसम के बसंती छींटों ने क्या आग जिगर में लगाई है
होंटों पे हँसी पैहम आते हुए शरमाती
अब रात नहीं कटती अब नींद नहीं आती
शाम नहीं ढलती किसी सूरत रात नहीं कटती किसी तौर
अब तो बहुत दिल घबराए है अब तो बहुत याद आओ हो