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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

कभी न ख़त्म होने वाली रात पर शेर

इक रात वो गया था जहाँ बात रोक के

अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के

फ़रहत एहसास

ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया

तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर अपने ही भरोसे पर पछतावा और आत्म-तिरस्कार दिखाता है। वादा पूरा न होने से इंतज़ार इतना भारी और लंबा लगता है कि उसे “क़यामत” जैसा कहा गया है। यहाँ क़यामत अंत-काल नहीं, बल्कि मन की घबराहट, टूटन और निराशा का रूपक है।

दाग़ देहलवी

रात आ कर गुज़र भी जाती है

इक हमारी सहर नहीं होती

इब्न-ए-इंशा

न पाया वक़्त ऐ ज़ाहिद कोई मैं ने इबादत का

शब-ए-हिज्राँ हुई आख़िर तो सुब्ह-ए-इंतिज़ार आई

मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस

ये वही रात है जिस में कोई रोने वाला

रोने लगता है तो रोता ही चला जाता है

तरकश प्रदीप

शाम-ए-ग़म की सहर नहीं होती

या हमीं को ख़बर नहीं होती

इब्न-ए-इंशा

शाम-ए-ग़म की सहर नहीं होती

आह भी कारगर नहीं होती

साजिद सिद्दीक़ी लखनवी
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