उर्दू अदब की तारीख़ में फ़ोर्ट विलियम कॉलेज (18 अगस्त 1800) की स्थापना से एक नए और अहम दौर की शुरुआत हुई, जिसने ज़बान और बयान के तमाम पुराने साँचे बदल कर रख दिए। कॉलेज की स्थापना से पहले उर्दू नस्र (गद्य) की हालत बहुत पेचीदा थी। उस वक़्त की नस्र फ़ारसी के असर में मुक़फ़्फ़ा (तुकबंदी वाली), मुसज्जा (सजावटी) और भारी-भरकम अल्फ़ाज़ से बोझल होती थी। यह ज़बान अवाम की बोल-चाल से कोसों दूर थी और ज़्यादातर पढ़े-लिखे ख़ास लोगों तक सीमित थी।
फ़ोर्ट विलियम कॉलेज अंग्रेज़ अफ़सरों को स्थानीय ज़बान सिखाने के लिए क़ायम किया गया था। इसलिए उन्हें ऐसी ज़बान की ज़रूरत थी, जो आम हिंदुस्तानियों की बोल-चाल के क़रीब हो। रोज़मर्रा के दफ़्तरी और सार्वजनिक कामों के लिए आसान और सरल उर्दू चाहिए थी। इसी ज़रूरत के तहत कॉलेज के उस्तादों और मुंशियों ने मुश्किल और बनावटी ज़बान छोड़कर सीधी, आसान और मुहावरेदार उर्दू में किताबें लिखनी शुरू कीं।
इस दौर में ‘बाग़-ओ-बहार’, ‘तोता कहानी’, ‘आराइश-ए-महफ़िल’ और ‘अख़लाक़-ए-हिंदी’ जैसी अहम किताबें सामने आईं, जिन्हें आज भी उर्दू के क्लासिकी अदब में ख़ास जगह हासिल है। इन किताबों ने साबित किया कि उर्दू नस्र (गद्य) बिना किसी बनावट और दिखावे के भी अपने अंदर बे-पनाह कशिश और रवानी रख सकती है। यह कहना ग़लत न होगा कि आधुनिक उर्दू नस्र की बा-क़ायदा बुनियाद इसी कॉलेज की चारदीवारी में रखी गई।
इस अदबी इंक़िलाब में प्रिंटिंग प्रेस का किरदार भी बहुत अहम रहा। फोर्ट विलियम कॉलेज से पहले उर्दू की किताबें हाथ से लिखी जाती थीं, जिसकी वजह से उन तक आम पाठक की पहुँच मुश्किल थी। कॉलेज की देख-रेख में उर्दू किताबें नस्तअलीक़ (उर्दू लिपि की एक शैली) टाइप में हज़ारों की तादाद में छपने लगीं। छपाई की इस सहूलत ने न सिर्फ़ किताबों को महफ़ूज़ किया बल्कि उर्दू पढ़ने वालों का दायरा भी बेहद विस्तृत कर दिया। आज हम जिस आधुनिक और आसान उर्दू नस्र (गद्य) पर फ़ख़्र करते हैं, वह दरअस्ल फोर्ट विलियम कॉलेज की इसी ऐतिहासिक ज़रूरत और साहित्यिक कोशिश का नतीजा है।
