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हलक़ा-ए-अरबाब-ए-ज़ौक़ ने अदब को सियासी और अख़लाक़ी तानाशाही से नजात दिलाने की कोशिश की, जिस पर तरक़्क़ी पसंदों ने उन पर हैयत-परस्ती (रूपवाद) और जिंस-परस्ती (कामुकता) के इल्ज़ाम लगाए।
यह लेख उर्दू और फ़ारसी ज़बानों में रामायण के तर्जुमों और मुस्लिम व हिंदू शायरों की जानिब से राम-कथा को नज़्म करने की शानदार साझी रिवायत पर रोशनी डालता है।
वली दकनी की पांडुलिपियों की बड़ी तादाद उनकी बे-पनाह लोकप्रियता और उनकी शायरी की ख़ालिस दुनियावी और जमालियाती (सौंदर्यवादी) कशिश का सुबूत है।
सर सैयद अहमद ख़ान की अदबी तहरीक सिर्फ़ अख़लाक़ी (नैतिक) सुधार तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह पश्चिमी इल्म हासिल करने और इस्लाम के सुनहरे दौर की सादगी को अपनाने का एक संतुलित और हक़ीक़त-पसंद संगम थी।
इक़बाल ने उर्दू अदब को रूमानियत के सपनों वाले माहौल और पश्चिम के दबदबे से निकाल कर एक नया, ताक़तवर और फ़िक्री गहराई पर आधारित उसलूब (शैली) दिया जिसने अदब की धारा मोड़ दी।
मुशायरे की शुरुआत, अरबी दौर-ए-जाहिलियत (इस्लाम से पहले का ज़माना) की सभाओं से लेकर ईरान की जागीरदाराना सभ्यता और फिर हिंदुस्तान के मुग़ल दरबारों तक के तहज़ीबी सफ़र का एक तफ़सीली जायज़ा।
फ़ारसी के ज़वाल (पतन) के बाद उर्दू मुशायरों का उरूज (उदय), दिल्ली और लखनऊ के अमीरों की सरपरस्ती, और मुशायरे के उन आदाब और नियमों का बयान जिन्होंने ज़बान को तो संवारा लेकिन तख़्लीक़ी (रचनात्मक) आज़ादी को सीमित कर दिया।
पिछली एक सदी के उर्दू अदब पर पंजाब वालों की गहरी छाप है, जिसके बिना उर्दू शायरी और नस्र (गद्य) का दामन बेहद ग़रीब और ख़ाली नज़र आता है।
यह मज़मून इस बात पर रोशनी डालता है कि उर्दू की लिपि बदलकर उसे रोमन या देवनागरी में करने की तजवीज़ (प्रस्ताव) दरअस्ल उर्दू ज़बान और इसके सदियों पुराने अदबी सरमाये (साहित्यिक खज़ाने) को मौत के घाट उतारने के बराबर है।
मौलाना हाली की 'यादगार-ए-ग़ालिब' में दर्ज इस मशहूर क़िस्से का आलोचनात्मक और ऐतिहासिक जायज़ा कि क्या वाक़ई मीर तक़ी मीर ने ग्यारह साल के ग़ालिब के शेर सुनकर उनके एक अज़ीम शायर बनने की भविष्यवाणी की थी।
उर्दू ज़बान का अस्ल नाम 'हिंदी' था, जिसे अंग्रेज़ों ने अपनी 'बाँटो और राज करो' की नीति के तहत 'उर्दू' या 'लश्करी ज़बान' का नाम दे दिया।
वली दकनी की ज़बान और शायरी अचानक वजूद में नहीं आई, बल्कि यह औरंगाबाद के ख़ास भाषाई माहौल और हसन शौक़ी जैसे उनसे पहले के शाइरों की देन थी।
ग़ोरियों के दौर में दिल्ली का केंद्र बनना और फिर मुहम्मद तुग़लक़ के दौर में दक्कन जाने से उर्दू और हिंदी की साझा ज़बान के विकास के चरणों का जायज़ा।
दिल्ली के शुरुआती शायरों ने वली दकनी के असर को महसूस तो किया, लेकिन इलाक़ाई भेदभाव के कारण उनकी बरतरी (श्रेष्ठता) को खुले दिल से मानने में हिचकिचाहट का शिकार रहे।
यह लेख उर्दू ज़बान के शुरुआती दौर की नफ़्सियाती कश्मकश (मानसिक उलझन), फ़ारसी के दबदबे और वली दकनी की शायरी के उस इंक़िलाबी (क्रांतिकारी) असर का जायज़ा लेता है जिसने उर्दू को एक बा-क़ायदा अदबी (साहित्यिक) ज़बान का दर्जा दिलाया।
वली दकनी की वफ़ात की तारीख़ तय करना सिर्फ़ एक तारीख़ी बहस नहीं है, बल्कि इसके पीछे दिल्ली के तज़किरा-निगारों की गहरी अदबी सियासत काम कर रही है।
वली दकनी को शाह गुलशन की तरफ़ से रेख़्ता-गोई (उर्दू शायरी) में फ़ारसी विषयों को बाँधने के मशवरे की कहानी दरअस्ल दिल्ली के तज़किरा निगारों (इतिहासकारों) की मनगढ़ंत उपज है।
यह लेख फोर्ट विलियम कॉलेज के योगदान और ख़ास तौर पर मीर अम्मन की 'बाग़-ओ-बहार' के उस भाषाई संतुलन पर चर्चा करता है जिसने उर्दू नस्र (गद्य) को सादगी और रवानी दी।
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