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इक़बाल ने ग़ज़ल की ज़बान से अनजान होने का दावा करने के बा-वुजूद, अपनी अनोखी शब्द-रचनाओं और ग़ैर-मुरद्दफ़ (बिना रदीफ़ वाली) ग़ज़लों के ज़रिए उर्दू ग़ज़ल को एक नया वैश्विक और वैचारिक विस्तार दिया।
फ़िराक़ गोरखपुरी के नज़दीक ग़ज़ल की अस्ल तरक़्क़ी इसके ज़ाहिरी उसूलों में नहीं बल्कि शायर के भीतरी एहसासात और विजदान (अनुभूति) के बदलाव में छिपी है।
मीर तक़ी मीर के यहाँ 'गुल' (फूल) और 'चमन' (बाग़) की अलामतें (प्रतीक) ख़ुद-रौ (अपने आप उगने वाली) फ़ितरत (प्रकृति) की नहीं, बल्कि उभरती हुई शहरी तहज़ीब और मुग़लों के नफ़ासत-पसंद (सुरुचिपूर्ण) 'पाईं बाग़' की अक्कास (दर्शाने वाली) हैं।
उर्दू ग़ज़ल ज़ाहिरी तौर पर हुस्न और इश्क़ की दास्तान है, लेकिन अपनी रम्ज़िया (प्रतीकात्मक) ज़बान और शेरी-मंतिक़ (काव्यात्मक तर्क) के कारण ये ज़िंदगी और कायनात के गहरे फ़लसफ़ियाना (दार्शनिक) सवालों को भी बख़ूबी बयान करती है।
इस्तिआरा (रूपक) और अलामत (प्रतीक) के बीच के नाज़ुक फ़र्क़ की वज़ाहत; इस्तिआरा मुशाहिदे (अवलोकन) पर आधारित होता है, जबकि अलामत एक गहरे इल्म (ज्ञान) और कई मानी को ज़ाहिर करती है।
शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की आलोचनात्मक समझ की रोशनी में रचनात्मक ज़बान के बुनियादी तत्वों, तश्बीह, इस्तिआरा और पैकर, का विश्लेषण और उनकी समझ।
हिंदी इल्म-ए-बदीअ (अलंकार शास्त्र) में इंसानी जज़्बात और एहसासात को नौ (9) क़िस्मों में बाँटा गया है, जिसे अल्लामा शिबली अरबी और फ़ारसी के मुक़ाबले में ज़्यादा वैज्ञानिक मानते हैं।
ग़ज़ल की सबसे बड़ी शर्त शब्दों का कम से कम और सही इस्तेमाल है। ग़ैर-ज़रूरी शब्दों (हश्व) और बात पूरी न कर पाने (इज्ज़-ए-नज़्म) से शेर की ख़ूबसूरती तबाह हो जाती है।
कबीर ने अपने पेशे यानी कपड़ा बुनने की शब्दावली का इस्तेमाल करते हुए इंसानी ज़िंदगी, रूह और कायनात के पेचीदा फ़लसफ़े को एक निहायत ख़ूबसूरत और अछूते रूपक में ढाल दिया।
मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली के नज़दीक तख़य्युल (Imagination) वह फ़ितरी (प्राकृतिक) और बुनियादी सलाहियत है जो एक शायर को ग़ैर-शायर से अलग करती है और नामुमकिन चीज़ों को मुमकिन बनाकर पेश करने की ताक़त रखती है।
ग़ालिब की मुश्किल-पसंदी का अस्ल राज़ उनके इस्तिआरे (रूपक) के इस्तेमाल में छिपा है, जहाँ वे विरोधी सच्चाइयों को मिलाकर एक ऐसी बहुआयामी सच्चाई रचते हैं जिसे शेर से अलग नहीं किया जा सकता।
तख़य्युल (कल्पना) सिर्फ़ ख़यालों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अल्फ़ाज़ और मालूमात (जानकारी) को एक नई और हैरत-अंगेज़ तरतीब देकर पेश करता है, जिसकी बेहतरीन मिसालें मिर्ज़ा ग़ालिब के कलाम में मिलती हैं।
जोश मलीहाबादी जैसे आधुनिक शायरों ने क्लासिकी (शास्त्रीय) शायरी के उसूलों से अनजान होने के कारण अपनी शायरी में शब्दों के बेमेलपन और बेवजह तकरार (दोहराव) जैसी कमियाँ पैदा कीं।
तख़य्युल की ऊँची उड़ान को अक़्ल और कुव्वत-ए-मुमय्यज़ा (परखने की सलाहियत) की लगाम की ज़रूरत होती है, वरना बे-लगाम तख़य्युल शायर को बे-तुकी बातों और गुमराही की तरफ ले जाता है।
यह लेख मीर तक़ी मीर की शायरी में इस्तिआरे (रूपक) और किनाये (संकेत) के पेचीदा इस्तेमाल पर रोशनी डालता है, और पश्चिमी आलोचना के हवालों से साबित करता है कि मीर के यहाँ इस्तिआरे महज़ सजावट नहीं बल्कि क़ौल-ए-मुहाल (विरोधाभास) और तंज़ (व्यंग्य) का ज़रिआ है।
इक़बाल को आमतौर पर 'पैग़ाम' का शायर समझा जाता है, लेकिन उनका कलाम क्लासिकी शेरियात, रिआयत, मुनासिबत और ईहाम के बेहतरीन फ़न्नी नमूनों से मालामाल है।
तख़य्युल (कल्पना) को परवान चढ़ने के लिए कायनात और इंसानी फ़ितरत को गहराई से देखने और समझने की ज़रूरत होती है, वरना यह ताक़त कमज़ोर पड़ कर बे-असर हो जाती है।
ख़यालात कितने ही बुलंद क्यों न हों, अगर शायर को शब्दों के चुनाव और उनकी तरतीब पर पूरी महारत हासिल नहीं है, तो उसकी शायरी बे-असर और अधूरी रहती है।
फ़साहत सिर्फ़ अलग-अलग अल्फ़ाज़ की ख़ूबसूरती का नाम नहीं है, बल्कि यह अल्फ़ाज़ की आवाज़ और अर्थ के उस तालमेल का नाम है जो कलाम को एक दिलकश नग़्मा बना देता है।
नई तनक़ीद (आलोचना) ने ईहाम और रियायत को अक्सर 'लफ़्ज़ी बाज़ीगरी' कह कर ख़ारिज किया है, लेकिन अस्ल में यह ज़बान की संभावनाओं और अर्थ की गहराइयों को खोजने की एक महान कला है।
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