‘क़व्वाली’ शब्द अरबी के ‘क़ौल’ से निकला है, जिसका मतलब है ‘बात’ या ‘कहना और बयान करना’। धीरे-धीरे यह शब्द संगीत की एक ख़ास शैली के लिए इस्तिमाल होने लगा। इसमें सूफ़ियाना कलाम और रूहानी बातें गाकर पेश की जाती हैं। क़व्वाली की ख़ास पहचान उसका इज्तिमाई (सामूहिक) गाने का अंदाज़, ताल और संगीत है।
भारतीय उपमहाद्वीप में क़व्वाली के फ़न को जो कभी न ख़त्म होने वाली मक़बूलियत और ज़िंदगी हासिल हुई है, उसका सेहरा बेशक हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के ख़ास मुरीद (शिष्य) और अज़ीम विचारक व शाइर हज़रत अमीर ख़ुसरो के सर जाता है। अमीर ख़ुसरो को सब की सहमति से क़व्वाली का जन्मदाता माना जाता है। यह उनके फ़न की सच्चाई, गहराई और रूहानियत की सबसे बड़ी दलील है कि सात सदियाँ गुज़र जाने के बाद भी उनसे जुड़ी यह संगीत-परंपरा पूरी शान के साथ ज़िंदा है और आज भी इसे पसंद करने वालों की बड़ी तादाद मौजूद है।
अमीर ख़ुसरो की शायरी और क़व्वाली में जो बे-पनाह मिठास और कशिश पाई जाती है, उसके पीछे एक मशहूर सूफ़ी क़िस्सा बयान किया जाता है। कहा जाता है कि एक बार अमीर ख़ुसरो अपने मुर्शिद (आध्यात्मिक गुरु) हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ की कि उनकी शायरी में ऐसी मिठास आ जाए जो दुनिया में बे-मिसाल हो। सच्चे मुर्शिद ने अपने इस चहेते और आज्ञाकारी मुरीद (शिष्य) की अर्ज़ी सुनी और फ़रमाया कि चारपाई के नीचे शकर रखी है, उसे निकालो, ख़ुद भी खाओ और वहाँ मौजूद लोगों में भी बाँट दो। ख़ुसरो ने इस हुक्म का पालन किया, और उसके बाद उनकी ज़बान और कलाम में वह मिठास पैदा हुई कि आज सात सौ साल बाद भी उसकी मिठास में ज़र्रा बराबर कमी नहीं आई।
अमीर ख़ुसरो की पैदाइश 1252 ईस्वी (651 हिजरी) में उत्तर प्रदेश के क़स्बे पटियाली में हुई, जो गंगा नदी के किनारे बसा है। उनके वालिद अमीर सैफ़ुद्दीन महमूद तुर्क मूल के थे, जबकि उनकी वालिदा एक भारतीय राजनेता की बेटी थीं। इस तरह ख़ुसरो के ख़ानदान में तुर्की और भारतीय तहज़ीब (संस्कृति) का मेल था। इसी मेल ने उनके फ़न को एक अनोखा और ख़ास हिंदुस्तानी रंग दिया। उन्होंने अपनी शायरी और संगीत में मुख़्तलिफ़ रंगों के मेल से एकता पैदा करने की ऐसी शानदार मिसाल पेश की, जिसका असर बाद के फ़नकारों पर भी पड़ा।
ख़ुसरो को उनके दौर के बादशाह ने "मलिकुश-शुअरा" (कविसम्राट्) के ख़िताब से नवाज़ा था, लेकिन हक़ीक़त में वह शायरी की दुनिया के ऐसे शहंशाह साबित हुए जिसकी सल्तनत को आज तक कोई चुनौती नहीं दे सका। वह भारतीय उपमहाद्वीप की तमाम ज़बानों के सबसे बड़े शायर माने जाते हैं। उनसे मंसूब क़व्वालियाँ जैसे "छाप तिलक सब छीनी रे" और "ऐ री सखी री मोरे ख़्वाजा घर आए" वक़्त और जगह की क़ैद से आज़ाद होकर आज भी हर ख़ास-ओ-आम की ज़बान पर हैं। उन्होंने क़व्वाली की ज़बान को फ़ारसी से निकालकर धीरे-धीरे हिंदवी और रेख़्ता के साँचे में ढाला, जिससे इस फ़न में इसी मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू रच-बस गई और यह अवाम के दिलों की धड़कन बन गई।
