मेरे ही ख़ून में नहला के 'शरर'
वो सलीबों पे सजा देगा मुझे
पूछो मस्लूब करने वालों से
अब तो मासूम हो गया हूँ मैं
अब तो ज़रूरत की इक पगड़ी है यारों के कंधों पर
हम लोगों के साथ यहाँ से रस्म-ए-सलीब-ओ-दार उठी
न जब अहल-ए-ख़िरद ने बात मानी
तो फिर शर्त-ए-सलीब-ओ-दार ठहरी