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महबूब पर शेर

महबूब के बारे मे कौन

सुनना या कुछ सुनाना नहीं चाहता। एक आशिक़ के लिए यही सब कुछ है कि महबूब की बातें होती रहें और उस का तज़किरा चलता रहे। महबूब के तज़किरे की इस रिवायत में हम भी अपनी हिस्से दारी बना रहे हैं। हमारा ये छोटा सा इन्तिख़ाब पढ़िए जो महबूब की मुख़्तलिफ़ जहतों को मौज़ू बनाता है।

तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो

तुम को देखें कि तुम से बात करें

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर पास बैठे प्रिय की मौजूदगी में पैदा हुई मीठी झिझक को दिखाता है। देखने का सुख इतना गहरा है कि बोलने की हिम्मत रुक-रुक जाती है। मन में चाह भी है कि बात हो, और डर भी कि बोलते ही वह नाज़ुक सा पल टूट जाए। इसी दुविधा में प्रेम की तीव्रता झलकती है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

तुम्हारी आँखों की तौहीन है ज़रा सोचो

तुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है

मुनव्वर राना

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा

कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा

इब्न-ए-इंशा

इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी

लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे

बशीर बद्र

हम से कोई तअल्लुक़-ए-ख़ातिर तो है उसे

वो यार बा-वफ़ा सही बेवफ़ा तो है

जमील मलिक

सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है

कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं

अहमद फ़राज़

तुम हुस्न की ख़ुद इक दुनिया हो शायद ये तुम्हें मालूम नहीं

महफ़िल में तुम्हारे आने से हर चीज़ पे नूर जाता है

साहिर लुधियानवी

फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं

फिर वही ज़िंदगी हमारी है

Interpretation: Rekhta AI

शायर कहता है कि वह फिर से उसी पत्थर-दिल महबूब के प्यार में पड़ गया है जो वफ़ा नहीं करता। इस वजह से उसकी ज़िंदगी उसी पुराने मोड़ पर खड़ी हुई है जहाँ सिर्फ़ दर्द और इंतज़ार है। यह शेर बताता है कि आशिक चाह कर भी अपनी पुरानी आदतों और अपनी तड़प से पीछा नहीं छुड़ा पाता और वही दुख भरी ज़िंदगी जीने को मजबूर है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

जिस भी फ़नकार का शहकार हो तुम

उस ने सदियों तुम्हें सोचा होगा

अहमद नदीम क़ासमी

जिस तरफ़ तू है उधर होंगी सभी की नज़रें

ईद के चाँद का दीदार बहाना ही सही

अमजद इस्लाम अमजद

इक तुझ को देखने के लिए बज़्म में मुझे

औरों की सम्त मस्लहतन देखना पड़ा

फ़ना निज़ामी कानपुरी

जब मैं चलूँ तो साया भी अपना साथ दे

जब तुम चलो ज़मीन चले आसमाँ चले

जलील मानिकपूरी

ग़रज़ किसी से वास्ता मुझे काम अपने ही काम से

तिरे ज़िक्र से तिरी फ़िक्र से तिरी याद से तिरे नाम से

जिगर मुरादाबादी

बहुत दिनों से मिरे साथ थी मगर कल शाम

मुझे पता चला वो कितनी ख़ूबसूरत है

बशीर बद्र

चाँद सा मिस्रा अकेला है मिरे काग़ज़ पर

छत पे जाओ मिरा शेर मुकम्मल कर दो

बशीर बद्र

देखा हिलाल-ए-ईद तो आया तेरा ख़याल

वो आसमाँ का चाँद है तू मेरा चाँद है

अज्ञात

निगाह बर्क़ नहीं चेहरा आफ़्ताब नहीं

वो आदमी है मगर देखने की ताब नहीं

जलील मानिकपूरी

मेरी निगाह-ए-शौक़ भी कुछ कम नहीं मगर

फिर भी तिरा शबाब तिरा ही शबाब है

जिगर मुरादाबादी

साँस लेती है वो ज़मीन 'फ़िराक़'

जिस पे वो नाज़ से गुज़रते हैं

Interpretation: Rekhta AI

कवि ने ज़मीन को इंसान की तरह दिखाकर यह बताया है कि प्रिय के क़दमों से निर्जीव चीज़ों में भी जान जाती है। “साँस लेना” जागने, ताज़गी और जीवंतता का संकेत है। प्रिय का नाज़ से चलना उनके सौंदर्य और रुतबे को उभारता है, और बोलने वाले के मन में श्रद्धा भरा विस्मय पैदा करता है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

हम को अक्सर ये ख़याल आता है उस को देख कर

ये सितारा कैसे ग़लती से ज़मीं पर रह गया

इम्तियाज़ ख़ान

चराग़ चाँद शफ़क़ शाम फूल झील सबा

चुराईं सब ने ही कुछ कुछ शबाहतें तेरी

अंजुम इरफ़ानी

रौशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम

दहका हुआ है आतिश-ए-गुल से चमन तमाम

हसरत मोहानी

हम ख़ुदा के कभी क़ाइल ही थे

उन को देखा तो ख़ुदा याद आया

अज्ञात

पाँव साकित हो गए 'सरवत' किसी को देख कर

इक कशिश महताब जैसी चेहरा-ए-दिलबर में थी

सरवत हुसैन

क्या सितम है कि वो ज़ालिम भी है महबूब भी है

याद करते बने और भुलाए बने

कलीम आजिज़

क्यूँ वस्ल की शब हाथ लगाने नहीं देते

माशूक़ हो या कोई अमानत हो किसी की

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि नज़दीकी के समय में भी प्रिय दूरी बनाए रखता/रखती है। “धरोहर/अमानत” का बिंब बताता है कि जैसे प्रिय पर किसी और का दावा, मर्यादा या रोक हो। इसलिए मिलन की खुशी की जगह संदेह और जलन जाती है। भावना का केंद्र तड़प और अपने हक़ का सवाल है।

दाग़ देहलवी

वो चाँदनी में फिरते हैं घर घर ये शोर है

निकला है आफ़्ताब शब-ए-माहताब में

जलील मानिकपूरी

क्या जाने उसे वहम है क्या मेरी तरफ़ से

जो ख़्वाब में भी रात को तन्हा नहीं आता

Interpretation: Rekhta AI

शायर अपने महबूब की अत्यधिक सावधानी और शक की शिकायत कर रहा है। महबूब शायर से इतना बचता है कि सपने में भी, जहाँ एकांत होना चाहिए, वह किसी किसी को साथ लेकर आता है ताकि शायर के साथ अकेला रहना पड़े।

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

मुझ को दिल पसंद वो बेवफ़ा पसंद

दोनों हैं ख़ुद-ग़रज़ मुझे दोनों हैं ना-पसंद

बेख़ुद देहलवी

तश्बीह तिरे चेहरे को क्या दूँ गुल-ए-तर से

होता है शगुफ़्ता मगर इतना नहीं होता

अकबर इलाहाबादी

ज़ालिम की तो आदत है सताता ही रहेगा

अपनी भी तबीअत है बहलती ही रहेगी

वहशत रज़ा अली कलकत्वी

चाँदनी रातों में चिल्लाता फिरा

चाँद सी जिस ने वो सूरत देख ली

रिन्द लखनवी

चाँद मशरिक़ से निकलता नहीं देखा मैं ने

तुझ को देखा है तो तुझ सा नहीं देखा मैं ने

सईद क़ैस

दुनिया से कहो जो उसे करना है वो कर ले

अब दिल में मिरे वो अलल-एलान रहेगा

फ़रहत एहसास

रौशनी के लिए दिल जलाना पड़ा

कैसी ज़ुल्मत बढ़ी तेरे जाने के बअ'द

ख़ुमार बाराबंकवी

कि मैं देख लूँ खोया हुआ चेहरा अपना

मुझ से छुप कर मिरी तस्वीर बनाने वाले

अख़्तर सईद ख़ान

फूल महकेंगे यूँही चाँद यूँही चमकेगा

तेरे होते हुए मंज़र को हसीं रहना है

अशफ़ाक़ हुसैन

हाथ में चाँद जहाँ आया मुक़द्दर चमका

सब बदल जाएगा क़िस्मत का लिखा जाम उठा

बशीर बद्र

आसमाँ झाँक रहा है 'ख़ालिद'

चाँद कमरे में मिरे उतरा है

ख़ालिद शरीफ़

ज़िंदगी कहते हैं किस को मौत किस का नाम है

मेहरबानी आप की न-मेहरबानी आप की

रशीद लखनवी

उस दुश्मन-ए-वफ़ा को दुआ दे रहा हूँ मैं

मेरा हो सका वो किसी का तो हो गया

हफ़ीज़ बनारसी

तेरे क़ुर्बान 'क़मर' मुँह सर-ए-गुलज़ार खोल

सदक़े उस चाँद सी सूरत पे हो जाए बहार

क़मर जलालवी

जल्वा-गर बज़्म-ए-हसीनाँ में हैं वो इस शान से

चाँद जैसे 'क़मर' तारों भरी महफ़िल में है

क़मर जलालवी

अदा-ओ-नाज़ करिश्मा जफ़ा-ओ-जौर-ओ-सितम

उधर ये सब हैं इधर एक मेरी जाँ तन्हा

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

मेरा माशूक़ है मज़ों में भरा

कभू मीठा कभू सलोना है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

मसअला ये है उस के गाँव को

दूसरा रास्ता नहीं जाता

जावेद मेहदी

खिंचा खिंचा नज़र आता है हम से हर आँचल

सितारे तोड़ के लाएँ तो लाएँ किस के लिए

अलीम उस्मानी

दिन चढ़ आया क्यों नहीं आए जाएँ उन से पूछ आएँ

लेकिन उन के पास तो दिल कोई बहाना होगा ही

कुमार पाशी

वो जिस ने छीन ली है ज़िंदगानी

मताअ-ए-ज़िंदगानी भी वही है

कैफ़ी चिरय्याकोटी

ख़ुदा की तरह कोई आदमी भी है शायद

नज़र जो आता नहीं आस-पास हो कर भी

नदीम भाभा
बोलिए