ख़ुदारा इक निगाह-ए-नाज़ ही से देख लो हम को
गरेबाँ फाड़ने को आज हम तय्यार बैठे हैं
महज़ ख़्वाबों ख़यालों में तिरा दीदार हो कब तक
हक़ीक़त में भी तुझ से आश्नाई चाहते हैं हम
हुस्न होता है किसी शय का कोई अपना ही
और फिर देखने वाले की नज़र होती है
आ जाएँ वक़्त-ए-नज़अ' तो मैं उन को देख लूँ
अरमान कोई दिल में अब इस के सिवा नहीं
तुम्हें जो देख ले इक बार देखता रह जाए
तुम्हारा हुस्न मोहब्बत का इस्ति'आरा है
मुझे तो तेरी बर्बादी भी बर्बादी नहीं लगती
कि मैं ने वो भी देखा है जो है बर्बाद से आगे
तुम तो फिर ग़ैर हो तुम से तो शिकायत कैसी
मेरे अपने मुझे ग़ैरों की तरह देखते हैं
हुस्न-ए-दिलकश इसे कहते हैं कि हम सारी उम्र
उन को देखा किए दीदार की हसरत न गई
तुम्हारी दीद की ख़्वाहिश लिए वो बैठे हैं
तुम्हारी दीद ही बीमार की शिफ़ा ठहरी
खिड़की के अपनी उस ने भी पर्दे गिरा लिए
मेरे भी रास्ते की रुकावट नहीं रही
ज़माने को तमन्ना है तिरा दीदार करने की
मुझे ये फ़िक्र है मुझ को मिरा दीदार हो जाए
मेरी निगाह-ए-शौक़ का जादू भी कम नहीं
आँखों में आँखें डाल के देखा न कीजिए
तुझे इक बार क्या 'वासिफ़' ने देखा
तुझे फिर देखने की आरज़ू है
ख़ाना है सैल से ख़ू-कर्दा-ए-दीदार हुनूज़
दूरबीं दर-ज़दा है रख़्ना-ए-दीवार हुनूज़
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ घर को बीते हुए समय की यादों का गवाह बताया गया है, जो अब भी प्रिय के दर्शन की आदत नहीं छोड़ पाया। “सैल” बहुत अधिक मुलाक़ातों और उमड़ते भावों का संकेत है, पर अब वह दौर नहीं रहा। दीवार की दरार पर लगी “दूरबीन” जुदाई में भी देखने की तड़प और छोटी-सी उम्मीद का रूपक है। भाव में स्मृति, विरह और ज़िद्दी आशा साथ चलती हैं।
दीदार-ए-ज़ुल-जलाल पे आमादा हो गया
क्या हौसला निगाह-ए-दिल-ए-ना-तवाँ का था
तिरे रंग-ओ-बू को भी देखते न ख़याल था न मजाल थी
जो सकत मिली तुझे देखने की तो रंग-ओ-बू से निकल गए
हो गई दीद मौत से पहले
आज अरमाँ निकल गए सारे