अवनीश त्रिवेदी अभय
ग़ज़ल 9
अशआर 8
नींद वैसे भी नहीं आती मगर
आँख में अब बस ख़ुमारी चाहिए
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कौन रहता है सफ़र में 'उम्र भर
मुस्तक़िल कोई ठिकाना चाहिए
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खिड़की के अपनी उस ने भी पर्दे गिरा लिए
मेरे भी रास्ते की रुकावट नहीं रही
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तन्हाइयाँ सफ़र में मुसलसल बनी रहीं
फिर भी तुम्हारा नाम पुकारे चले गए
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घर बनाने में 'उम्र लगती है
घर में बनते मकान देखे हैं
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