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अनुवाद11
फ़िराक़ गोरखपुरी के शेर
एक मुद्दत से तिरी याद भी आई न हमें
और हम भूल गए हों तुझे ऐसा भी नहीं
Interpretation:
Rekhta AI
यह दो पंक्तियाँ मन की उलझन दिखाती हैं: याद न आना और भूल जाना एक बात नहीं। बोलने वाला कहता है कि लंबे समय से खयाल नहीं आया, फिर भी मन के अंदर का लगाव खत्म नहीं हुआ। दूरी और चुप्पी के बीच भी प्यार की हल्की मौजूदगी बनी रहती है।
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शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास
दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में बाहर की धुंधली शाम और भीतर की उदासी एक-दूसरे से जुड़ जाती है। धुआँ-धुआँ वातावरण मन की उलझन और भारीपन का रूपक है, और “हुस्न” का उदास होना बताता है कि खुशी देने वाली चीज़ें भी फीकी पड़ गई हैं। ऐसे समय कई पुरानी, अधूरी बातें याद की तरह उभरती हैं और मन से जाती नहीं—बस चुप-सी टीस बनकर रह जाती हैं।
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं
Interpretation:
Rekhta AI
कवि कहता है कि अनुभव के कारण वह आने वाली बात को पहले ही भांप लेता है। “कदमों की आहट” ज़िंदगी के दुख-सुख, उसकी जिम्मेदारियाँ और बार-बार लौटने वाले हालात का संकेत है। ज़िंदगी से सीधे बात करके वह जताता है कि अब उसे कोई भ्रम नहीं रहता। भाव में थकान, समझ और स्वीकार का मेल है।
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तुम मुख़ातिब भी हो क़रीब भी हो
तुम को देखें कि तुम से बात करें
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कोई समझे तो एक बात कहूँ
इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं
Interpretation:
Rekhta AI
कवि कहता है कि यह बात हर किसी को नहीं समझ आती, इसलिए वह केवल समझदार से बोलता है। वह प्रेम को दोष और पाप मानने के बजाय उसे ‘तौफ़ीक़’ यानी ऊपर से मिली शक्ति/कृपा बताता है। इस तरह प्रेम पर लगने वाले नैतिक आरोपों को वह पलट देता है और उसे ऊँचा, पवित्र अनुभव बनाता है। भाव यह है कि प्रेम को दंड नहीं, आदर मिलना चाहिए।
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मौत का भी इलाज हो शायद
ज़िंदगी का कोई इलाज नहीं
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर उलटी-सी लगने वाली सच्चाई कहता है: मौत के लिए तो शायद कोई हल सोच लिया जाए, पर जीवन की उलझन, बेचैनी और दर्द का पूरा इलाज नहीं। यहाँ “इलाज” दवा से ज़्यादा राहत और छुटकारे का संकेत है। भाव में थकान, असहायता और जीवन की कठोरता का अनुभव झलकता है।
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हम से क्या हो सका मोहब्बत में
ख़ैर तुम ने तो बेवफ़ाई की
Interpretation:
Rekhta AI
वक्ता स्वीकार करता है कि प्रेम निभाने में उससे कमी रह गई और वह असमर्थ रहा। दूसरे पंक्ति में ‘चलो’ का ताना है: वक्ता भले कुछ न कर सका, पर सामने वाले ने एक काम पक्का किया—विश्वास तोड़ना। यही विरोध भावनात्मक चोट, शिकायत और कड़वे व्यंग्य को गहरा करता है।
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मैं हूँ दिल है तन्हाई है
तुम भी होते अच्छा होता
Interpretation:
Rekhta AI
यह दो पंक्तियाँ अकेलेपन की पूरी तस्वीर बना देती हैं—मनुष्य, उसका दिल और सूनी-सी खाली जगह। “दिल” यहाँ बेचैनी और भावनाओं का संकेत है, जो अकेले में और तेज़ हो जाती हैं। दूसरी पंक्ति में शिकायत नहीं, बस एक सीधी-सी चाह है कि तुम्हारी मौजूदगी से यह खालीपन कम हो जाता। भावनात्मक असर इसकी सादगी से पैदा होता है।
तेरे आने की क्या उमीद मगर
कैसे कह दूँ कि इंतिज़ार नहीं
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ मन मान लेता है कि मिलने की संभावना कम है, पर दिल इंतज़ार छोड़ नहीं पाता। शेर की खूबी इसी विरोध में है: उम्मीद कम होते हुए भी प्रतीक्षा बनी रहती है। प्रेम की बेबसी और अटूट लगाव इसकी भावनात्मक धुरी है।
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आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़'
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर एक विडंबना दिखाता है: जहाँ मस्ती की उम्मीद होती है, वहीं पीकर आदमी गंभीर हो जाता है। यहाँ शराब केवल नशा नहीं, अनुभव और सच्चाई का प्रतीक भी है, जो हँसी को कम करके सोच को जगा देती है। भाव यह है कि जैसे ही अंदर समझ बढ़ती है, बेफिक्री खत्म हो जाती है।
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न कोई वा'दा न कोई यक़ीं न कोई उमीद
मगर हमें तो तिरा इंतिज़ार करना था
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर प्रेम की मजबूरी और समर्पण को दिखाता है: सामने से न वादा है, न भरोसा, न उम्मीद—फिर भी मन रुक नहीं पाता और प्रतीक्षा करता रहता है। पहली पंक्ति की बार-बार की “न” खालीपन और टूटती आशा को गहरा करती है, और दूसरी पंक्ति में “करना था” प्रतीक्षा को जैसे भाग्य बना देता है।
ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त
वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर बताता है कि जीवन का समय एक ही बात में खर्च हो गया—कभी याद में, कभी भूलने के प्रयास में। याद करना और भूलना अलग लगते हैं, पर दोनों में मन उसी व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। “कट गए” से दिन काटने का दर्द और थकान झलकती है। भावनात्मक सार यह है कि बिछोह ने जीने को संघर्ष बना दिया।
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अब तो उन की याद भी आती नहीं
कितनी तन्हा हो गईं तन्हाइयाँ
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर जुदाई के बाद के सूनेपन को बयान करता है, जब यादें भी धीरे-धीरे साथ छोड़ देती हैं। यहाँ “अकेलापन” को इंसान की तरह दिखाकर कहा गया है कि तन्हाई इतनी गहरी हो गई है कि दुख का साथी भी नहीं बचता। भाव का केंद्र खालीपन, टूटन और भीतर की चुप्पी है।
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सर-ज़मीन-ए-हिंद पर अक़्वाम-ए-आलम के 'फ़िराक़'
क़ाफ़िले बसते गए हिन्दोस्ताँ बनता गया
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर भारत को ऐसी भूमि बताता है जहाँ अलग-अलग समुदाय आते रहे और यहीं के होकर रह गए। “क़ाफ़िले” लगातार आने-जाने और बसने की धाराओं का संकेत हैं। भाव यह है कि अनेकता के साथ रहने और मिलकर बसने से ही हिंदुस्तान की साझा पहचान धीरे-धीरे बनी।
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ये माना ज़िंदगी है चार दिन की
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर जीवन की छोटी अवधि को “चार दिन” कहकर मानता है, पर साथ ही बताता है कि इतना-सा समय भी अनुभवों और भावनाओं से भर जाता है। दुख, सुख, इंतज़ार और यादें मिलकर इन “चार दिनों” को भारी बना देती हैं। “दोस्तों” कहकर कवि इसे अपनापन और समझ के साथ कहता है।
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सुनते हैं इश्क़ नाम के गुज़रे हैं इक बुज़ुर्ग
हम लोग भी फ़क़ीर उसी सिलसिले के हैं
Interpretation:
Rekhta AI
कवि प्रेम को एक साधना की तरह दिखाता है, जैसे उसकी भी कोई परंपरा और गुरु-परंपरा हो। “महापुरुष” का उल्लेख प्रेम की ऊँचाई बताता है, और खुद को “भिखारी/साधक” कहना विनम्रता और समर्पण दिखाता है। भाव यह है कि हम भी उसी पवित्र प्रेम-मार्ग से जुड़े हुए हैं।
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रात भी नींद भी कहानी भी
हाए क्या चीज़ है जवानी भी
Interpretation:
Rekhta AI
कवि ‘रात’, ‘नींद’ और ‘कहानी’ को जोड़कर जवानी की दुनिया को सपनों, कल्पना और प्रेम-भाव से भरा दिखाता है। ‘हाय’ में खुशी की चमक के साथ थोड़ा सा अफ़सोस भी है, मानो यह सब बहुत जल्दी बीत जाता हो। भाव यह है कि जवानी जादुई भी है और क्षणभंगुर भी।
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मैं मुद्दतों जिया हूँ किसी दोस्त के बग़ैर
अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो ख़ैर
Interpretation:
Rekhta AI
वक्ता कहता है कि उसने लंबे समय तक अकेलापन सहा है, इसलिए अब किसी और का छोड़ जाना और भी भारी लगता है। “ख़ैर” में ऊपर से शांति है, पर भीतर चोट और कसक छिपी है। यह शेर थकी हुई सहनशीलता और चुप शिकायत को एक साथ दिखाता है। विदाई यहाँ केवल विदाई नहीं, एक तंज भी बन जाती है।
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कम से कम मौत से ऐसी मुझे उम्मीद नहीं
ज़िंदगी तू ने तो धोके पे दिया है धोका
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ वक्ता मौत को सीधी और तय मानता है—वह आती है तो अंत कर देती है, छल नहीं करती। शिकायत जीवन से है, जो भरोसा और आशा देकर बार-बार तोड़ता है और हर बार नए रूप में धोखा देता है। भाव-केन्द्र में मोहभंग और गहरी पीड़ा है।
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बहुत दिनों में मोहब्बत को ये हुआ मा'लूम
जो तेरे हिज्र में गुज़री वो रात रात हुई
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर बताता है कि जुदाई सहने के बाद ही प्रेम अपनी गहराई को पहचानता है। “रात” यहाँ अँधेरा, अकेलापन और मन का भारीपन है, और “रात-रात” कहकर दुख का लगातार चलना दिखाया गया है। प्रिय के बिना समय खिंच जाता है, इसलिए थोड़ी-सी अवधि भी बहुत लंबी लगती है। भावनात्मक केंद्र एक देर से होने वाला बोध है—बिछोह ने प्रेम का अर्थ समझा दिया।
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इक उम्र कट गई है तिरे इंतिज़ार में
ऐसे भी हैं कि कट न सकी जिन से एक रात
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में ‘उम्र’ और ‘रात’ के विरोध से भावना की तीव्रता दिखती है। प्रिय के इंतज़ार में जीवन भी बीत जाता है, क्योंकि वहाँ चाह और लगाव है; लेकिन कुछ साथ ऐसे होते हैं जो एक रात में ही असह्य लगते हैं। यही तुलना प्रेम की दृढ़ता और नापसंद की बेचैनी को उजागर करती है।
जो उन मासूम आँखों ने दिए थे
वो धोके आज तक मैं खा रहा हूँ
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर मासूमियत और धोखे के टकराव पर टिका है। प्रिय की ‘मासूम’ आँखें बाहर से सच्ची लगती हैं, पर वही आकर्षण प्रेमी को भटका देता है। वक्त बीत गया, फिर भी उस भ्रम का असर खत्म नहीं हुआ। भाव में प्रेम के साथ पछतावा और लंबे समय तक रहने वाली पीड़ा है।
लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है
उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी
Interpretation:
Rekhta AI
फ़िराक़ गोरखपुरी ने शहीदों के बलिदान को आज़ादी की असली कीमत और पहचान के रूप में दिखाया है। “रंग लाया” का अर्थ है कि त्याग का फल मिला और सच सामने आया। “नाम-ए-आज़ादी” को ऐसी आवाज़ की तरह रखा गया है जो समय में उछलकर फैलती है। भाव में गौरव के साथ उन कुर्बानियों के प्रति श्रद्धा भी है।
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आने वाली नस्लें तुम पर फ़ख़्र करेंगी हम-असरो
जब भी उन को ध्यान आएगा तुम ने 'फ़िराक़' को देखा है
Interpretation:
Rekhta AI
कवि अपने समय के लोगों से कहता है कि उनका यह अनुभव भविष्य में सम्मान की बात बनेगा। ‘फ़िराक़’ को देखना केवल मुलाक़ात नहीं, महानता का साक्षी बनना है। शेर में ख्याति, विरासत और स्मरण का भाव है—आज का एक क्षण कल की पीढ़ियों के लिए गौरव बन जाता है।
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किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
ये हुस्न ओ इश्क़ तो धोका है सब मगर फिर भी
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Rekhta AI
यह शेर जीवन का कड़वा अनुभव कहता है कि प्रेम में पूरी, स्थायी मिल्कियत या साथ बहुत कम मिलता है। ‘सुंदरता’ और ‘प्रेम’ को ‘धोखा’ कहना उनके उस वादे की ओर इशारा है जो पूरा नहीं होता और दिल को भटकाता है। फिर भी, बार-बार आता “फिर भी” बताता है कि समझ आ जाने पर भी मन खिंचता रहता है। इसी समझ और चाह की खींचतान में शेर की पीड़ा है।
ज़रा विसाल के बाद आइना तो देख ऐ दोस्त
तिरे जमाल की दोशीज़गी निखर आई
Interpretation:
Rekhta AI
कवि मिलन के बाद आईना दिखाकर कहता है कि असर खुद दिख जाएगा। आईना यहाँ सच्चाई और अपने-आप को देखने का संकेत है, और “कुमारपन” सौंदर्य की कोमल, नई-सी चमक को बताता है। भाव यह है कि प्रेम और निकटता से सुंदरता घटती नहीं, बल्कि और निखर जाती है।
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तबीअत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में
हम ऐसे में तिरी यादों की चादर तान लेते हैं
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ सुनसान रातें अकेलेपन और डर का संकेत हैं। कवि कहता है कि जब मन घबराता है, तो वह प्रिय की यादों में शरण लेता है। ‘चादर’ एक रूपक है, जो गर्माहट, सुरक्षा और आराम दिखाता है। यानी दूरी के बीच भी यादें उसे संभाल लेती हैं।
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ज़िंदगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त
सोच लें और उदास हो जाएँ
Interpretation:
Rekhta AI
कवि दोस्त से कहता है कि जीवन का मतलब आज ही टटोल कर देखो। जब हम जीवन की नश्वरता और अधूरापन साफ़ समझते हैं, तो मन में एक शांत-सी उदासी उतर आती है। यहाँ सोच-विचार ही सच्चाई से सामना है, और वही सच्चाई भारी लगती है।
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खो दिया तुम को तो हम पूछते फिरते हैं यही
जिस की तक़दीर बिगड़ जाए वो करता क्या है
Interpretation:
Rekhta AI
यह दोहा-जैसा असर रखने वाला शेर बिछड़ने की चोट और बेचैनी दिखाता है। प्रिय के चले जाने से बोलने वाले को लगता है कि जीवन की पूरी चाल ही उलट गई। इसलिए वह एक ही सवाल दोहराता है, क्योंकि उसे सब कुछ किस्मत के आगे बेबस लगता है। भाव का केंद्र तड़प, निराशा और असहायता है।
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पाल ले इक रोग नादाँ ज़िंदगी के वास्ते
सिर्फ़ सेह्हत के सहारे उम्र तो कटती नहीं
Interpretation:
Rekhta AI
कवि व्यंग्य के साथ कहता है कि केवल शरीर की सेहत से जीवन पूरा नहीं होता। यहाँ “रोग” किसी गहरी लगन, प्रेम, चिंता या कसक का रूपक है, जो मन को सचमुच जागता रखती है। बिना किसी अंदरूनी बेचैनी के जीवन सुरक्षित तो हो सकता है, पर फीका पड़ जाता है। इसलिए वह सेहत के साथ अर्थ और तीव्रता देने वाले किसी भाव की जरूरत बताता है।
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कुछ न पूछो 'फ़िराक़' अहद-ए-शबाब
रात है नींद है कहानी है
Interpretation:
Rekhta AI
कवि जवानी को सीधे-सीधे बयान नहीं कर पाता, इसलिए पूछने से रोकता है। जवानी उसे रात जैसी लगती है—धुंधली, पास की, और जल्दी बीत जाने वाली। उस अँधेरे में यादें नींद और सपने में घुल जाती हैं, और बीता हुआ समय कहानी बनकर रह जाता है। इसमें कसक और बीते पल की नश्वरता का भाव है।
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अब याद-ए-रफ़्तगाँ की भी हिम्मत नहीं रही
यारों ने कितनी दूर बसाई हैं बस्तियाँ
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर दूरी और बिछोह का दर्द दिखाता है। बीते लोगों की याद भी इतना भारी बोझ बन गई है कि उसे उठाने का साहस नहीं रहा। दोस्तों की “दूर बसी बस्तियाँ” इस बात का रूपक हैं कि सब अपनी-अपनी दुनिया में आगे निकल गए, और बोलने वाला अकेला, खालीपन के साथ रह गया।
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कोई आया न आएगा लेकिन
क्या करें गर न इंतिज़ार करें
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर मन के दो हिस्सों को दिखाता है: दिमाग़ कहता है कि अब कोई आने वाला नहीं, पर दिल इंतज़ार छोड़ नहीं पाता। इंतज़ार यहाँ तर्क नहीं, प्रेम की मजबूरी है। भावनात्मक केंद्र बेबस उम्मीद है—सब कुछ जानकर भी प्रतीक्षा करते रहना।
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तुझ को पा कर भी न कम हो सकी बे-ताबी-ए-दिल
इतना आसान तिरे इश्क़ का ग़म था ही नहीं
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर बताता है कि मिलन से भी प्रेम की बेचैनी खत्म नहीं होती। दिल की बेचैनी यहाँ उस चाह की निशानी है जो पाने के बाद भी शांत नहीं पड़ती। भाव यह है कि प्रेम का दुःख गहरा और टिकाऊ होता है, उसे आसानी से हल नहीं किया जा सकता।
देख रफ़्तार-ए-इंक़लाब 'फ़िराक़'
कितनी आहिस्ता और कितनी तेज़
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर बदलाव की अजीब गति पर रोशनी डालता है: बाहर से लगता है कि कुछ नहीं हो रहा, पर अंदर ही अंदर तैयारी चलती रहती है। जब समय पकता है तो वही बदलाव बहुत तेज़ी से सामने आ जाता है। ‘क्रांति’ यहाँ गहरे सामाजिक या मन के परिवर्तन का रूपक भी है। भाव में हैरानी और सजगता है—समय की धीमी मेहनत और उसकी अचानक छलांग का एहसास।
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इसी खंडर में कहीं कुछ दिए हैं टूटे हुए
इन्हीं से काम चलाओ बड़ी उदास है रात
Interpretation:
Rekhta AI
खंडहर जीवन की टूटन और खालीपन का संकेत है, और टूटे दीये बची हुई छोटी-सी आशा या सहारा। कवि कहता है कि पूरी रोशनी न सही, पर इन अधूरे दीयों से भी गुज़ारा कर लो, क्योंकि उदास रात दुख और अकेलेपन की लंबी घड़ी है। भाव यह है कि कठिन समय में थोड़ा-सा सहारा भी संभालने के काम आता है।
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साँस लेती है वो ज़मीन 'फ़िराक़'
जिस पे वो नाज़ से गुज़रते हैं
Interpretation:
Rekhta AI
कवि ने ज़मीन को इंसान की तरह दिखाकर यह बताया है कि प्रिय के क़दमों से निर्जीव चीज़ों में भी जान आ जाती है। “साँस लेना” जागने, ताज़गी और जीवंतता का संकेत है। प्रिय का नाज़ से चलना उनके सौंदर्य और रुतबे को उभारता है, और बोलने वाले के मन में श्रद्धा भरा विस्मय पैदा करता है।
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रोने को तो ज़िंदगी पड़ी है
कुछ तेरे सितम पे मुस्कुरा लें
Interpretation:
Rekhta AI
कहने वाला मानता है कि दुख तो बहुत है और रोना जीवन भर चलता रह सकता है। इसलिए वह इस चोट पर तुरंत टूटने के बजाय एक कड़वी-सी मुस्कान चुनता है, जैसे अपने दर्द पर खुद का अधिकार जताना हो। इसमें व्यंग्य भी है और हिम्मत भी—जुल्म को अंतिम सच मानने से इंकार।
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तुम इसे शिकवा समझ कर किस लिए शरमा गए
मुद्दतों के बा'द देखा था तो आँसू आ गए
Interpretation:
Rekhta AI
कवि कहता है कि यह कोई उलाहना नहीं, बस दिल में जमा भावनाओं का बहाव था। बहुत समय बाद मिलने पर याद और चाह इतनी तेज़ हुई कि आँखें भर आईं। सामने वाला इसे शिकायत मानकर संकोच करता है, जबकि सच में यह प्रेम की कोमल सच्चाई है। यह दो पंक्तियाँ मिलन की तीव्रता और गलतफ़हमी दोनों को दिखाती हैं।
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मैं देर तक तुझे ख़ुद ही न रोकता लेकिन
तू जिस अदा से उठा है उसी का रोना है
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Rekhta AI
कवि कहता है कि वह बस यूँ ही रोकता नहीं रहा; असली चोट जाने से ज़्यादा, जाने के तरीके से लगी है। “अदा” यानी उठने का ढंग ऐसा है जिसमें बेरुख़ी या अंतिमता झलकती है, इसलिए दिल टूटता है। दुख इस बात का है कि विदाई में अपनापन नहीं रहा। यह लगाव, पछतावा और बेबसपन का भाव है।
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आज बहुत उदास हूँ
यूँ कोई ख़ास ग़म नहीं
Interpretation:
Rekhta AI
यह दोहा/शेर बिना कारण वाली उदासी को दिखाता है, जब मन पर एक भारीपन छा जाता है। वक्ता कहता है कि कोई एक घटना नहीं, बस भीतर की मनःस्थिति है। इसी सादगी में इसका भाव गहरा हो जाता है—ऐसी उदासी हर किसी को कभी न कभी घेर लेती है।
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लाई न ऐसों-वैसों को ख़ातिर में आज तक
ऊँची है किस क़दर तिरी नीची निगाह भी
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Rekhta AI
यह शेर कहता है कि बोलने वाला तुच्छ किस्म के लोगों को कभी ध्यान में नहीं लाता, और फिर सामने वाले पर व्यंग्य करता है कि तुम्हारी नीचे देखकर देखने की आदत भी तुम्हारी ऊँची अकड़ दिखाती है। ‘नीची नज़र’ यहाँ तिरस्कार का संकेत है, और ‘ऊँची’ अहं व हैसियत का। भाव में शिकायत के साथ-साथ चुभता हुआ व्यंग्य भी है।
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ज़ब्त कीजे तो दिल है अँगारा
और अगर रोइए तो पानी है
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर दुःख से निपटने के दो तरीकों को दिखाता है: दबा लेना और रो देना। जब भावनाएँ दबाई जाती हैं तो भीतर की जलन बढ़ती है, इसलिए दिल को ‘अंगारा’ कहा गया है। रोने पर वही जलन ‘पानी’ बनकर आँसुओं में निकलती है और मन का बोझ कुछ हल्का होता है।
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कौन ये ले रहा है अंगड़ाई
आसमानों को नींद आती है
Interpretation:
Rekhta AI
कवि साधारण-सी अंगड़ाई को बहुत बड़ा, ब्रह्मांड-सा असर देने वाली घटना बना देता है। आसमानों को नींद आना मानवीकरण है: जैसे किसी की हल्की-सी हरकत या रात की शांति से पूरे वातावरण पर सुस्ती और मिठास छा गई हो। इसमें चकित करने वाली कल्पना और प्रेम की नर्म-सी अनुभूति है।
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तिरे पहलू में क्यूँ होता है महसूस
कि तुझ से दूर होता जा रहा हूँ
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर पास होकर भी मन के दूर हो जाने की पीड़ा दिखाता है। “पहलू” नज़दीकी और अपनापन है, लेकिन उसी नज़दीकी में दूरी का एहसास बताता है कि संबंध की गर्माहट कम हो रही है या भीतर से टूटन आ रही है। दुख इस बात का है कि साथ रहते हुए भी अलगाव शुरू हो सकता है।
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जिस में हो याद भी तिरी शामिल
हाए उस बे-ख़ुदी को क्या कहिए
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर उस अनोखी स्थिति की हैरानी दिखाता है जिसमें इंसान खुद को भूल जाता है, फिर भी प्रिय की याद साथ रहती है। आम तौर पर मस्ती में सब कुछ धुंधला हो जाता है, लेकिन यहाँ याद और मस्ती एक साथ घुल जाती हैं। इसी मेल में प्रेम की तीव्रता और तड़प का भाव है, जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है।
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सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं
लेकिन इस तर्क-ए-मोहब्बत का भरोसा भी नहीं
EXPLANATION #1
न दिमाग में कोई दीवानगी है और न दिल में कोई चाह बाकी है।
फिर भी मुझे इस बात का भरोसा नहीं कि मैं सचमुच प्रेम छोड़ पाया हूँ।
कवि कहता है कि अब न तो जुनून है, न चाहत, जैसे सब शांत हो गया हो। लेकिन अपने ही “प्रेम-त्याग” पर उसे संदेह है, क्योंकि भावनाएँ छिपकर भी जीवित रह सकती हैं और फिर लौट आती हैं। यह दो पंक्तियाँ बाहरी विरक्ति और भीतर की अनिश्चितता का द्वंद्व दिखाती हैं। इसी उलझन में कविता का भावनात्मक दर्द बसता है।
शफ़क़ सुपुरी
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देवताओं का ख़ुदा से होगा काम
आदमी को आदमी दरकार है
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यह शेर बताता है कि बड़े-बड़े दिव्य सहारे अपनी जगह हैं, लेकिन इंसान की असली जरूरत इंसान ही पूरा करता है। दुख, कमी और अकेलेपन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ किसी अपने की मदद और साथ है। भाव यह है कि जीवन में मानवीय करुणा और एकजुटता ही सच्चा सहारा बनती है।
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पर्दा-ए-लुत्फ़ में ये ज़ुल्म-ओ-सितम क्या कहिए
हाए ज़ालिम तिरा अंदाज़-ए-करम क्या कहिए
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कवि कहता है कि प्रिय की कठोरता दया के रूप में सामने आती है, जैसे दर्द को प्यार का नाम दे दिया गया हो। यही विडंबना इस शेर का केंद्र है: बाहर से नरमी, भीतर से चोट। “मेहरबानी का ढंग” कहकर वह उस दिखावे पर तंज करता है जो प्रेमी को और असहाय बना देता है।
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कह दिया तू ने जो मा'सूम तो हम हैं मा'सूम
कह दिया तू ने गुनहगार गुनहगार हैं हम
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Rekhta AI
यहाँ बोलने वाला अपनी पहचान का फ़ैसला सामने वाले के शब्दों पर छोड़ देता है। मासूमियत या अपराध सच से नहीं, उस एक फैसले से तय हो जाते हैं। भाव यह है कि प्रेम में वह पूरी तरह समर्पित और बेबस है; सही-गलत से ज़्यादा उसे वही मान लेना मंज़ूर है जो कहा जाए।
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