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गणतंत्र दिवस पर शेर

शायरी में वतन-परस्ती

के जज़्बात का इज़हार बड़े मुख़्तलिफ़ ढंग से हुआ है। हम अपनी आम ज़िंदगी में वतन और इस की मोहब्बत के हवाले से जो जज़्बात रखते हैं वो भी और कुछ ऐसे गोशे भी जिन पर हमारी नज़र नहीं ठहरती इस शायरी का मौज़ू हैं। ये अशआर पढ़िए और इस जज़बे की रंगारंग दुनिया की सैर कीजिए।

दिल से निकलेगी मर कर भी वतन की उल्फ़त

मेरी मिट्टी से भी ख़ुशबू-ए-वफ़ा आएगी

लाल चन्द फ़लक

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा

हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा

हमारा हिंदुस्तान सारी दुनिया से अच्छा है।

हम इसके गाने वाले पंछी हैं और यही हमारा बाग है।

यह दोहा देश के प्रति प्रेम और गर्व की बात करता है और हिंदुस्तान को सबसे श्रेष्ठ बताता है। ‘बुलबुल’ और ‘गुलिस्तान’ के रूपक से देश को बाग और लोगों को उसकी मधुर आवाज़ वाले पंछी कहा गया है—देश उन्हें सहारा देता है और वे उसे रौनक देते हैं। भाव अपनापन, एकता और सामूहिक पहचान का है।

अल्लामा इक़बाल

वतन की रेत ज़रा एड़ियाँ रगड़ने दे

मुझे यक़ीं है कि पानी यहीं से निकलेगा

मुज़फ़्फ़र वारसी

लहू वतन के शहीदों का रंग लाया है

उछल रहा है ज़माने में नाम-ए-आज़ादी

देश के शहीदों के खून का असर अब साफ़ दिखाई देने लगा है।

अब दुनिया में हर जगह आज़ादी का नाम गूंज रहा है और उभर रहा है।

फ़िराक़ गोरखपुरी ने शहीदों के बलिदान को आज़ादी की असली कीमत और पहचान के रूप में दिखाया है। “रंग लाया” का अर्थ है कि त्याग का फल मिला और सच सामने आया। “नाम-ए-आज़ादी” को ऐसी आवाज़ की तरह रखा गया है जो समय में उछलकर फैलती है। भाव में गौरव के साथ उन कुर्बानियों के प्रति श्रद्धा भी है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

वतन की ख़ाक से मर कर भी हम को उन्स बाक़ी है

मज़ा दामान-ए-मादर का है इस मिट्टी के दामन में

चकबस्त बृज नारायण
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