राही मासूम रज़ा के शेर
इस सफ़र में नींद ऐसी खो गई
हम न सोए रात थक कर सो गई
हाँ उन्हीं लोगों से दुनिया में शिकायत है हमें
हाँ वही लोग जो अक्सर हमें याद आए हैं
ये चराग़ जैसे लम्हे कहीं राएगाँ न जाएँ
कोई ख़्वाब देख डालो कोई इंक़िलाब लाओ
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दिल की खेती सूख रही है कैसी ये बरसात हुई
ख़्वाबों के बादल आते हैं लेकिन आग बरसती है
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ज़िंदगी ढूँढ ले तू भी किसी दीवाने को
उस के गेसू तो मिरे प्यार ने सुलझाए हैं
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हम ने अपने जीने की ये राह निकाली यारो
हर दरिया पर थोड़ी थोड़ी प्यास बुझा ली यारो
बिजलियाँ ढूँढ रही हैं कोई गिरने की जगह
इतने महफ़ूज़ नहीं आज नशेमन वाले
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टैग : बिजली
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कैसे कोई तस्वीर बनाऊँ रंग उड़े जाते हैं
घोले कितने रंग मगर है चाँद का प्याला ख़ाली
ग़ैर अँधेरे की आँखों में घोल के आँसू अपने
जब रात आई शौक़-ए-सहर की शम' जलाली यारो
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कभी मक़्तल रहा होगा यक़ीनन
जहाँ ज़ंजीर की झंकार ठहरी
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टैग : कर्बला
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मेरे साथ मिरा सूरज है मेरे साथ मिरा साया
तन्हाई तो उन की देखूँ जिन के साथ ज़माना है
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क्यों इतने मग़रूर हैं 'राही' क्यों इतना इतराते हैं
गंगा तट वीरान न होगा इक उन के उठ जाने से
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बरसों बा'द इस हिज्र के पेड़ पे मोर आए
बरसों बा'द इस पेड़ पे कोयल बोली है
सर-ब-कफ़ घर से निकलना तो है शर्त-ए-अव्वल
इतना आसान नहीं चाक-गरेबाँ होना
ख़िज़ाँ के रंग भी ऐसे बुरे नहीं लेकिन
ये रंग ठीक नहीं मेरे ख़ूब-रू के लिए
अब तो ज़रूरत की इक पगड़ी है यारों के कंधों पर
हम लोगों के साथ यहाँ से रस्म-ए-सलीब-ओ-दार उठी
दश्त-ए-जुनूँ की ज़िद है कि लिख ख़ैरियत का ख़त
मैं पूछता हूँ किस को लिखूँ और कहाँ लिखूँ
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टैग : ख़त
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मज़ा आता नसीहत में भी शायद
अगर नासेह ज़रा दीवाना होता
लगता है शहरों में जुनूँ के मौसम अब नहीं आते
हम तो सहरा में बैठे हैं धूप का फ़र्श बिछाए
मलमल की सारी है तन पर हाथों में पिचकारी है
हम ने सुना है उस की गली में होली की तय्यारी है
धूप कड़ी है साया मत दे साए का इम्कान तो है
ऐ सहरा तुझ से तो हमारी इतनी पुरानी यारी है
महक पहचानती है ख़ून-ए-दिल की
ज़मीन-ए-कूचा-ए-दिलदार ठहरी
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टैग : दिलदारी
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हम बरसों से पत्थर के इस शहर में हैं
कैसा है शीशे का जहाँ मा'लूम नहीं
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टैग : क़ैद
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मैं इक घाइल बूढ़ा बरगद मेरी बात सुनो
लगता है कल हर वादी से सहरा निकलेगा
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कल जिन आँखों में उगा करते थे ख़्वाब
आज उन में कल का अंदेशे मिला
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टैग : ख़्वाब
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कहीं सूरज मिले तो उस से कहना
हमारी रात लम्बी हो रही है
सन्नाटा पेड़ों पर बैठा सन्नाटा हर छत पर
सन्नाटे से सब डरते हैं कौन आवाज़ लगाए
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टैग : ख़ामोशी
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अपना सर वो कैसे झुकाए इस सागर की चौखट पर
गंगा जी के तट पर यारो जिस जोगी का ठिकाना है
जिस की प्यास को कम पड़ती हो सहरा की पहनाई भी
उस की प्यास न नापी जाए साक़ी के पैमाने से
सूलियाँ नस्ब रहीं क़हत-ए-जुनूँ है भी तो क्या
कुछ न कुछ अब भी निकल आएँगे गर्दन वाले
तेरी महफ़िल में वफ़ा की तो कोई क़द्र नहीं
हाँ मगर तज़्किरा-ए-अहल-ए-वफ़ा होता है
अहल-ए-जुनूँ की आहट सुन कर दश्त-ए-वफ़ा बेचैन हुआ
हर हर गोशे से पिछली ज़ंजीरों की झंकार उठी
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टैग : जुनून
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न जब अहल-ए-ख़िरद ने बात मानी
तो फिर शर्त-ए-सलीब-ओ-दार ठहरी
उस के गुलाबी रुख़्सारों पर फैली बूँद पसीने की
या कचनार के दामन पर ये ओस की हल्की धारी है
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टैग : हुस्न
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मकतब-ए-‘इश्क़ का ये पहला सबक़ है 'राही'
हाथ कटवा ले मगर हाथ को प्याला न बना
सच अगर बोलूँ तो कटती है ज़बान
और चुप रहने में रुस्वाई है
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वो ज़ियारत-गह-ए-मजनूँ बहुत आबाद हुई
अपनी वहशत के लिए अब कोई वीराना बना
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टैग : वहशत
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जिस को मिल जाना हो मिल जाओ मगर मुश्किल से
देखो इस शह्र में आना तो न आसाँ होना
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टैग : नसीहत
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जिस के आगे आगे बादल जिस के पीछे ख़ुशबू
हम सहरा वालों तक कोई वो मौसम ले आए
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टैग : मौसम
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कल की जानिब देखें कैसे एक बड़ी दुश्वारी है
आँख उठाना सहल नहीं है सपना इतना भारी है
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टैग : ख़्वाब
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जाग और दामान-ए-वहशत चाक कर
सिर्फ़ आँखें ही न मल ऐ बम्बई
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टैग : प्रेरणादायक
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गया न कोई मिरे बा'द कू-ए-क़ातिल तक
तरस गया कफ़-ए-क़ातिल रग-ए-गुलू के लिए