मैं मोहब्बत में बहुत सों को ख़ुदा मानता हूँ
तुम किसी एक का पूछोगे तो माँ बोलूँगा
तू जिस के दम पर भी बोलता है
मिरे ख़ुदा से बड़ा नहीं है
शे'र कह के गुज़ार सकते हैं
ज़िंदगी हो या माँ का दिन 'काशिफ़'
जबीनों पर निशाँ सज्दों के हैं हाथों में शमशीरें
अक़ीदे ने तशद्दुद के बदन को ओढ़ रखा है
अपना सर वो कैसे झुकाए इस सागर की चौखट पर
गंगा जी के तट पर यारो जिस जोगी का ठिकाना है
आप की भक्ती न जब तक हो तो क्या हासिल मुझे
क़ैद-ए-दुनिया से अगर हो जाऊँ मैं आज़ाद भी
तुम्हारी भी हिफ़ाज़त हम करेंगे
तुम्हारे फिर ख़ुदा होने का मतलब