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रद करें डाउनलोड शेर

ख़ुद्दारी पर शेर

ख़ुद्दारी या आत्मसम्मान

वह पूंजी है जिस पर शायर हमेशा नाज़ करता रहा है और इसे जताने में भी कभी झिझक महसूस नहीं की। अपने वुजूद की अहमियत को समझना और उसे पूरा-पूरा सम्मान देना शायरों की ख़ास पहचान भी रही है। शायर सब कुछ बर्दाश्त कर लेता है लेकिन अपनी ख़ुद्दारी पर लगने वाली हल्की सी चोट से भी तिलमिला उठता है। खुद्दारी शायरी कई ख़ूबसूरत मिसालों से भरी हैः

मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है

किसी का भी हो सर क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता

जावेद अख़्तर

किसी को कैसे बताएँ ज़रूरतें अपनी

मदद मिले न मिले आबरू तो जाती है

अज्ञात

किसी रईस की महफ़िल का ज़िक्र ही क्या है

ख़ुदा के घर भी न जाएँगे बिन बुलाए हुए

अमीर मीनाई

वक़्त के साथ बदलना तो बहुत आसाँ था

मुझ से हर वक़्त मुख़ातिब रही ग़ैरत मेरी

अमीर क़ज़लबाश

दुनिया मेरी बला जाने महँगी है या सस्ती है

मौत मिले तो मुफ़्त न लूँ हस्ती की क्या हस्ती है

फ़ानी बदायुनी

मैं तिरे दर का भिकारी तू मिरे दर का फ़क़ीर

आदमी इस दौर में ख़ुद्दार हो सकता नहीं

इक़बाल साजिद

हम तिरे ख़्वाबों की जन्नत से निकल कर आ गए

देख तेरा क़स्र-ए-आली-शान ख़ाली कर दिया

ऐतबार साजिद

गर्द-ए-शोहरत को भी दामन से लिपटने न दिया

कोई एहसान ज़माने का उठाया ही नहीं

हसन नईम

जिस दिन मिरी जबीं किसी दहलीज़ पर झुके

उस दिन ख़ुदा शिगाफ़ मिरे सर में डाल दे

कैफ़ भोपाली

इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुए आसमाँ से हम

हट कर चले हैं रहगुज़र-ए-कारवाँ से हम

असरार-उल-हक़ मजाज़

क्या मालूम किसी की मुश्किल

ख़ुद-दारी है या ख़ुद-बीनी

हैरत शिमलवी

अपने मे'यार से नीचे मैं भला क्यों आऊँ

तुम जिसे ज़ो'म समझते हो वो ख़ुद्दारी है

सय्यद अज़हर सज्जाद

ख़ूब जानता है ये इक फ़क़ीर हाथों में

कब है बे-कसी रखना कब है मो'जिज़ा रखना

सफ़र नक़वी

अमीर-ए-शहर की मिदहत न लिक्खी जाएगी हम से

कि जो ख़ुद्दार हैं वो कार-ए-दरबारी नहीं करते

डॉ. एजाज़ रसूल

अपाहिज और भी कर देंगी ये बैसाखियाँ तुझ को

सहारे आदमी से इस्तक़ामत छीन लेते हैं

मौलवी असलम वड़ाइच

अगर ज़िंदा ही रहना है तो रहिए अपनी शर्तों पर

कि ख़ुद्दारी से ख़ाली लोग सौ सौ बार मरते हैं

चरण सिंह बशर

वो क्या रुकेगा भला चार बूँद की ख़ातिर

जो आ रहा हो समुंदर को मार कर ठोकर

नदीम शाद

ग़ैरत तुम्हारे नाम से शर्मा रही है आज

कहते हो अपने आप को ख़ुद्दार चुप रहो

डॉ. फ़ौक़ करीमी

जबीन-ए-शौक़ हर इक दर पे ख़म नहीं होती

हर इक ज़मीन ज़मीन-ए-हरम नहीं होती

नूर क़ुरैशी

ये ख़ुद्दार होना ही लाया ख़राबी

मोहब्बत में इंसान ख़ुद्दार क्यूँ हो

नज़ीर सिद्दीक़ी

मुझे उस ने कहा बे-कार हूँ मैं

सो ख़ुद को राएगाँ रक्खा हुआ है

बिलाल अख़्तर

'उम्र भर अपने उसूलों पे ही चलता आया

सब गिराते रहे मुझ को मैं सँभलता आया

धर्मेश सोलंकी

मकतब-ए-‘इश्क़ का ये पहला सबक़ है 'राही'

हाथ कटवा ले मगर हाथ को प्याला न बना

राही मासूम रज़ा

कितने ख़ुद्दार थे कट कर न गिरे क़दमों पर

जितने सर आप ने नेज़े से उछाले देखे

शाईस्ता जमाल

बहुत ख़ुद्दार होना भी अना का एक पहलू है

घड़े का मुँह अगर उल्टा हो तो पानी नहीं भरता

सौरभ शर्मा सदफ़

टूट सकता नहीं तिरी ख़ातिर

आदमी हूँ कोई उसूल नहीं

क़ासिम रहमान

चेहरे बदल बदल के मैं आता नहीं कभी

जैसा भी जो भी हूँ अरे तुझ सा नहीं हूँ मैं

इरशाद देहलवी

अना के बोझ तले झुक गया हूँ मैं वर्ना

मिरे मिज़ाज में ऐसी फ़िरोतनी तो नहीं

जव्वाद सरवर सैय्यद

ख़ुद्दार हूँ ख़ुद-सर हूँ मैं ख़ुद-मस्त हूँ लेकिन

तू सामने आ जाए तो सर आज भी ख़म है

वासिफ़ अली वासिफ़
बोलिए