मुस्कुराना भी एक फ़न है 'अज़ीज़'
सब को आता नहीं ज़माने में
जबीन-ए-शौक़ हर इक दर पे ख़म नहीं होती
हर इक ज़मीन ज़मीन-ए-हरम नहीं होती
ग़ैर के हाथों में क्यूँ देते हो अपनी पगड़ी
बात घर की है तो फिर बात को घर रहने दो
ऐसे लोगों से हम नहीं मिलते
जिन की गर्दन में ख़म नहीं होता