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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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अज़ीज़ ग़व्वासी

1927 - 1981 | हावड़ा, भारत

उर्दू के ग़ज़लकार कवि और सामाजिक कार्यकर्ता

उर्दू के ग़ज़लकार कवि और सामाजिक कार्यकर्ता

अज़ीज़ ग़व्वासी

ग़ज़ल 14

अशआर 6

मुस्कुराना भी एक फ़न है 'अज़ीज़'

सब को आता नहीं ज़माने में

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सियाह ज़ुल्फ़ों की गोद में वो चमक रहा है रुख़-ए-मुनव्वर

कि एक सूरज उभर रहा है शब-ए-शिकस्ता की तीरगी से

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उस का ग़म पूछ सको तो पूछो

जिस ने मरने की मसर्रत चाही

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ग़म-ए-हयात का ये कौन सा मक़ाम आया

कि अपनी आह मुझे अजनबी सी लगती है

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जिस की आँखों में नहीं आँसू की बूँद

उस के लब पर क्या हँसी को ढूँढिए

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