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मीर तक़ी मीर के शेर
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
Interpretation:
Rekhta AI
कवि प्रिय के होंठों की कोमल सुंदरता पर मुग्ध है और मानता है कि उसे शब्दों में कहना पूरा नहीं हो पाता। गुलाब की पंखुड़ी की उपमा नर्मी, ताज़गी और नाज़ुकपन का भाव जगाती है। प्रश्नवाचक ढंग प्रशंसा को बढ़ाता है और उस सौंदर्य को अनोखा बताता है।
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राह-ए-दूर-ए-इश्क़ में रोता है क्या
आगे आगे देखिए होता है क्या
Interpretation:
Rekhta AI
मीर तक़ी मीर प्रेम को एक लंबी और कठिन यात्रा मानते हैं, जहाँ शुरुआत में ही रो पड़ना जल्दबाज़ी है। वक्ता धैर्य रखने को कहता है और संकेत देता है कि आगे और बड़ी कसौटियाँ आ सकती हैं। भाव यह है कि प्रेम का असली दर्द और सच आगे बढ़ने पर ही खुलता है।
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पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ वक्ता का दर्द इतना साफ़ है कि प्रकृति की हर चीज़ उसकी तड़प की गवाह बन जाती है। लेकिन “फूल” यानी प्रिय/जिससे उम्मीद है, वही अनजान या बेपरवाह रहता है। बाग़ का सब कुछ जानना और फूल का न जानना—यही विरह, चाह और उदासीनता की चोट को तीखा कर देता है।
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कोई तुम सा भी काश तुम को मिले
मुद्दआ हम को इंतिक़ाम से है
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ ‘इंतिक़ाम’ का मतलब चोट पहुँचाना नहीं, बल्कि व्यंग्य भरी कामना है कि प्रिय को अपना ही जैसा व्यवहार कहीं से वापस मिले। जब वह वही बेरुख़ी और ठेस झेलेगा, तब उसे अपनी बातों और रवैये का असर समझ आएगा। भावनात्मक केंद्र घायल प्रेम है, जो समझ दिलाने के लिए आईने जैसा बदला चाहता है।
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टैग : इंतिक़ाम
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अब तो जाते हैं बुत-कदे से 'मीर'
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर विदाई और मिलने की अनिश्चितता का भाव रखता है। प्रेमी प्रिय के ठिकाने को “बुत-कदा” कहकर उसे पूजा-सा मान देता है, पर साथ ही वहाँ से दूर जाना पड़ रहा है। “अगर ख़ुदा लाया” में उम्मीद भी है और यह बात भी कि फिर मिलना अपने बस में नहीं, किस्मत/ईश्वर की मरज़ी पर है।
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हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए
उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए
Interpretation:
Rekhta AI
मीर तक़ी मीर का कहना है कि प्रेम में सब बराबर हो जाते हैं—किसी को छूट नहीं मिलती। ‘ज़ुल्फ़ें’ यहाँ प्रियतम की सुंदरता का वह जाल है जो मन को बाँध लेता है। शेर में हल्की-सी हँसी के साथ गहरी बेबसी भी है: इस क़ैद से कोई बच नहीं पाता।
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आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम
अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में प्रेम की शुरुआत का उग्र जोश और अंत की थकान दिखती है। “आग” जुनून, बेचैनी और अपने-आप को जलाने वाली लगन का रूपक है, और “राख” उस जलन के बाद बची हुई खालीपन और टूटन को। भाव यह है कि प्रेम का अंत कभी-कभी मिलन नहीं, बल्कि खुद का मिट जाना होता है।
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उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ प्रेम और दुख को “दिल का रोग” कहा गया है, जो इंसानी कोशिशों और इलाज—दोनों को बेकार कर देता है। “काम तमाम” से पूरी हार, टूटन और अंतिमता का भाव आता है, मानो बचने का कोई रास्ता नहीं रहा। मूल भाव बेबसी है: अंदर का दर्द ही सबसे बड़ा निर्णायक बन जाता है।
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ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का
Interpretation:
Rekhta AI
मीर तक़ी मीर ने संसार को काँच की कार्यशाला का रूपक दिया है—सुंदर, पर बहुत जल्दी टूट जाने वाला। “धीरे साँस लेना” का मतलब है कि जीवन में हर कदम सोच-समझकर रखना चाहिए, क्योंकि यहाँ सब कुछ बहुत कोमल है। इस शेर में डर और आदर दोनों का भाव है—अस्तित्व अनमोल है, लेकिन क्षणभंगुर। इसलिए बोलचाल और कर्म में नरमी व सावधानी की सीख मिलती है।
मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में कहा गया है कि किसी व्यक्ति को हल्का नहीं आंकना चाहिए। “आसमान का बरसों घूमना” समय और भाग्य की लंबी प्रक्रिया का संकेत है, और “मिट्टी का परदा” हमारी धरती जैसी साधारण उत्पत्ति को दिखाता है। भाव यह है कि सच्ची इंसानियत और क़द्र धीरे-धीरे बनती है, तुरंत नहीं। इसमें आत्मसम्मान भी है और विनम्रता भी।
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मीर क्या सादे हैं बीमार हुए जिस के सबब
उसी अत्तार के लड़के से दवा लेते हैं
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ प्रेम-दुख को बीमारी और राहत को दवा का रूपक बनाकर कहा गया है। मीर अपनी ही भोलेपन पर तंज करते हैं कि जिसने चोट दी, उसी से मरहम की उम्मीद भी कर रहे हैं। “अत्तार का लड़का” संकेत देता है कि मदद उसी ओर से चाही जाती है जहाँ से दर्द मिला था। भाव है: विवश लगाव, आत्म-छल और कड़वी विडंबना।
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याद उस की इतनी ख़ूब नहीं 'मीर' बाज़ आ
नादान फिर वो जी से भुलाया न जाएगा
Interpretation:
Rekhta AI
कवि अपने ही मन को समझा रहा है कि प्रिय की याद को ज़रूरत से ज़्यादा सुंदर मत मानो। लेकिन वह जानता है कि एक बार फिर उसी याद को जगह दी, तो वह दिल पर चिपक जाएगी और मिटेगी नहीं। यहाँ प्रेम की तड़प, पछतावा और बेबस़ी साथ-साथ हैं। याद ही दिल की कैद बन जाती है।
बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो
ऐसा कुछ कर के चलो याँ कि बहुत याद रहो
Interpretation:
Rekhta AI
मीर तक़ी मीर कहते हैं कि जीवन में दुख और सुख दोनों आते-जाते रहते हैं, पर असली बात यह है कि इंसान ऐसा काम करे जो उसे यादगार बना दे। “यहाँ से चलो” जीवन-यात्रा के अंत का संकेत है। भाव यह है कि क्षणिक भावनाओं से ऊपर उठकर अर्थपूर्ण कर्म करो, ताकि तुम्हारी छाप बनी रहे।
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फूल गुल शम्स ओ क़मर सारे ही थे
पर हमें उन में तुम्हीं भाए बहुत
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर दुनिया की कई सुंदरताओं का नाम लेकर बताता है कि सुंदरता हर तरफ़ मौजूद है, फिर भी दिल की पसंद एक ही है—प्रिय। फूल और सूरज-चाँद अलग-अलग तरह की चमक और आकर्षण के प्रतीक हैं। भाव यह है कि सारी भव्यता के बीच भी प्रिय का स्थान सबसे ऊपर है।
फिरते हैं 'मीर' ख़्वार कोई पूछता नहीं
इस आशिक़ी में इज़्ज़त-ए-सादात भी गई
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में प्रेम को ऐसा अनुभव बताया गया है जो इंसान की इज़्ज़त और समाज में उसकी जगह दोनों मिटा देता है। मीर की हालत इतनी बिगड़ गई है कि लोग पूछते तक नहीं, और “सादात की इज़्ज़त” कहकर गिरावट को और गहरा किया गया है। भाव में पीड़ा, शर्म और नुकसान का तीखा एहसास है।
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'मीर' के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो
क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर पूछने वालों पर व्यंग्य करता है कि मीर की धार्मिक पहचान अब सवाल नहीं रही। “मंदिर” और “माथे का निशान” सीमा-लांघने और दूसरी दुनिया अपनाने के प्रतीक हैं। भाव यह है कि प्रेम की तीव्रता इंसान को परंपरागत धर्म-खानों से बाहर ले जाती है। लहजे में तंज और बेपरवाही है।
इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है
कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ इश्क़ को भारी पत्थर मानकर उसकी कठिनाई दिखाई गई है। कवि अपने-आप से या किसी कमज़ोर आशिक़ से कहता है कि प्रेम का भार उठाना साधारण बात नहीं। भाव यह है कि इश्क़ बड़ा और कठोर है, जबकि इंसान की ताक़त सीमित है, इसलिए भीतर बेबसी और दर्द है।
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शाम से कुछ बुझा सा रहता हूँ
दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का
Interpretation:
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यहाँ शाम उदासी और अकेलेपन का संकेत बनती है, जिससे मन की रोशनी कम हो जाती है। दिल की तुलना “गरीब के दीपक” से है, जिसमें तेल कम होता है, इसलिए वह कांपती-सी, धुंधली रोशनी देता है और कभी भी बुझ सकता है। इस रूपक से टूटन, थकान और भीतर की कमी का दर्द सामने आता है।
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सिरहाने 'मीर' के कोई न बोलो
अभी टुक रोते रोते सो गया है
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर ऐसे दुख का चित्र बनाता है जिसमें रोते-रोते इंसान थककर सो जाता है। वक्ता आसपास वालों से मौन रखने को कहता है ताकि यह नाज़ुक नींद टूट न जाए। यहाँ नींद थोड़ी राहत है और चुप्पी करुणा का रूप।
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इक़रार में कहाँ है इंकार की सी ख़ूबी
होता है शौक़ ग़ालिब उस की नहीं नहीं पर
Interpretation:
Rekhta AI
इस दोहे में प्रेम की उलटी-सी सच्चाई दिखाई गई है कि स्वीकार से ज़्यादा इनकार मन को खींचता है। प्रिय का “नहीं, नहीं” कठोर मना करना नहीं, बल्कि नाज़ और टालना माना गया है, जो प्रेमी की तड़प बढ़ा देता है। देरी और अनिश्चितता ही चाह को तेज़ करती है।
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दिल की वीरानी का क्या मज़कूर है
ये नगर सौ मर्तबा लूटा गया
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Rekhta AI
यहाँ दिल को एक नगर मानकर कहा गया है कि दुख और चोटें बार-बार उसे लूटती रही हैं। इतने नुकसान के बाद उजाड़पन का ज़िक्र भी बेकार लगता है, क्योंकि टूटना जैसे रोज़ की बात बन गया है। “सौ बार” का अतिशयोक्ति वाला प्रयोग लगातार दुख और मन की थकान को दिखाता है।
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होगा किसी दीवार के साए में पड़ा 'मीर'
क्या रब्त मोहब्बत से उस आराम-तलब को
Interpretation:
Rekhta AI
पहली पंक्ति में दीवार की छाया में पड़े होने से थकान और टूटन का भाव बनता है। दूसरी पंक्ति व्यंग्य में कहती है कि सच्चा प्रेम बेचैनी और लगन माँगता है, आराम की चाह नहीं। इस तरह प्रेम की तड़प और आराम-चाहत के बीच का विरोध सामने आता है।
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क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़
जान का रोग है बला है इश्क़
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मीर तक़ी मीर के यहाँ इश्क़ को समझाना भी कठिन है, क्योंकि यह साधारण भावना नहीं बल्कि बहुत गहरा अनुभव है। वे इश्क़ को “रोग” और “बला” कहकर बताते हैं कि यह मन-बहलाव नहीं, जीवन तक को पकड़ लेने वाली पीड़ा है। यह रूपक इश्क़ की तीव्रता और इंसान की बेबसी को सामने लाता है। भाव का केंद्र दर्द भरी सच्चाई और भीतर का डर-सा है।
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नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करें हैं हम को अबस बदनाम किया
Interpretation:
Rekhta AI
मीर तक़ी मीर के इस शेर में वक्ता कहता है कि जिसे कोई अधिकार ही नहीं, उस पर ‘अपने मन से करने’ का दोष लगाना अन्याय है। असल में दूसरा पक्ष अपनी ही इच्छा से सब करता है, लेकिन बदनामी और दोष कमज़ोर के हिस्से डाल देता है। भावनात्मक केंद्र बेबसी, चोट और अन्याय के खिलाफ़ शिकायत है।
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रोते फिरते हैं सारी सारी रात
अब यही रोज़गार है अपना
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर बताता है कि दुख इतना बढ़ गया है कि रात भर चैन नहीं मिलता, बस रोना और भटकना रह जाता है। ‘रोज़गार’ को रोने से जोड़कर कवि दिखाता है कि यह दर्द अब रोज़ का काम बन गया है। भाव में अकेलापन, थकान और दुख के सामने हार-सी स्वीकृति है।
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बे-ख़ुदी ले गई कहाँ हम को
देर से इंतिज़ार है अपना
Interpretation:
Rekhta AI
इस शे’र में ‘बेख़ुदी’ ऐसी हालत है जो इंसान को उसके ही केंद्र से दूर ले जाती है। कहने वाला इतना खो गया है कि उसका ‘अपना’ यानी उसका असली रूप उससे अलग होकर प्रतीक्षा कर रहा है। भाव भीतर की खालीपन, भटकाव और देर से होश में आने का है। दर्द यह है कि आदमी खुद से ही बिछड़ जाता है।
बेवफ़ाई पे तेरी जी है फ़िदा
क़हर होता जो बा-वफ़ा होता
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर विडंबना के साथ बताता है कि प्रेमी को प्रिय की बेवफ़ाई भी प्यारी लगती है, क्योंकि वह उसी दर्द में जीना सीख चुका है। अगर प्रिय सच में वफ़ादार होती, तो नज़दीकी और उम्मीद की तीव्रता उसे असह्य लगती। भाव यह है कि प्रेम इतना बढ़ गया है कि दुख ही उसकी आदत और पहचान बन गया है।
'मीर' उन नीम-बाज़ आँखों में
सारी मस्ती शराब की सी है
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ प्रिय की आधी खुली आँखों को शराब के नशे से जोड़ा गया है, यानी नशा किसी प्याले में नहीं, नज़र में है। यह रूपक बताता है कि प्रेम का असर बिना पीए ही आदमी को डगमगा देता है। भाव यह है कि उस दृष्टि का आकर्षण इतना गहरा है कि देखने वाला खुद पर काबू नहीं रख पाता, और आँखों की नरमी उसमें और मोहकता भर देती है।
'मीर' साहब तुम फ़रिश्ता हो तो हो
आदमी होना तो मुश्किल है मियाँ
Interpretation:
Rekhta AI
शेर हल्के व्यंग्य में कहता है कि फ़रिश्ता होना एक आदर्श-सी बात है, पर असली कठिनाई इंसानियत निभाने में है। यहाँ “इंसान” का मतलब दया, संयम और सही आचरण है जो रोज़मर्रा में साबित होता है। इस तरह ऊँची, कल्पित पाकीज़गी के सामने मानवीय होने की कठिन जिम्मेदारी रख दी जाती है।
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दिखाई दिए यूँ कि बे-ख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले
Interpretation:
Rekhta AI
प्रिय का दर्शन इतना तीव्र है कि प्रेमी की सुध-बुध चली जाती है और वह अपने ऊपर काबू नहीं रख पाता। पर यह मिलन नहीं बनता; उसी पल दूरी और बढ़ जाती है, मानो दर्शन के बाद भी प्रिय दूर चला गया। कविता में विरोधाभास है कि सामने आना भी अलगाव का कारण बन जाता है। भाव है तड़प, असहायता और प्रेम की तीखी चोट।
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गुल हो महताब हो आईना हो ख़ुर्शीद हो मीर
अपना महबूब वही है जो अदा रखता हो
Interpretation:
Rekhta AI
कवि कहता है कि बाहरी सुंदरता कई रूपों में मिलती है—फूल की ताज़गी, चाँद की शीतल रोशनी, आईने की चमक, सूरज का तेज़। लेकिन किसी को ‘प्रिय’ बनाने वाली चीज़ केवल रूप नहीं, बल्कि ‘अदा’ है: व्यवहार की नज़ाकत, बोलने-चलने का ढंग और मन को खींच लेने वाली मिठास। इसी अदा से सुंदरता में जान आ जाती है।
'मीर' अमदन भी कोई मरता है
जान है तो जहान है प्यारे
Interpretation:
Rekhta AI
यह दोहा उदासी और टूटन के सामने जीवन को बचाने की बात करता है। “जान” यहाँ सबसे बड़ा सहारा है और “जहान” उसका अर्थ—यानी मौके, रिश्ते और आगे का रास्ता। कवि प्रेम से समझाता है कि जीते रहोगे तो सब कुछ फिर से संभव हो सकता है।
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क्या कहें कुछ कहा नहीं जाता
अब तो चुप भी रहा नहीं जाता
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर मन की ऐसी दशा दिखाता है जहाँ बोलने की ताकत भी नहीं रहती, और चुप्पी निभाना भी कठिन हो जाता है। शब्द दर्द को ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते, लेकिन मौन भीतर की बेचैनी को और बढ़ा देता है। इसी दोहरी मजबूरी में पीड़ा, ललक और घुटन का भाव उभरता है।
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अब कर के फ़रामोश तो नाशाद करोगे
पर हम जो न होंगे तो बहुत याद करोगे
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इस दोहे में बोलने वाला आज की उपेक्षा पर दर्द के साथ चेतावनी देता है। वह कहता है कि अभी भूलना बाद में खुद ही दुख बन जाएगा, क्योंकि इंसान अक्सर मौजूद चीज़ की क़द्र नहीं करता। जब दूरी या अनुपस्थिति आती है, तब याद और पछतावा दोनों गहरे हो जाते हैं। भावनात्मक केंद्र प्रेम, चोट और आने वाली नدامत है।
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दिल्ली में आज भीक भी मिलती नहीं उन्हें
था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का
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Rekhta AI
यह शेर बीते हुए वैभव और आज की दरिद्रता का तीखा विरोध दिखाता है। ताज और सिंहासन सत्ता व घमंड के प्रतीक हैं, जबकि भीख न मिलना पूरी लाचारी का संकेत है। भाव यह है कि समय का फेर बहुत जल्दी ऊँचाई को गिरावट में बदल देता है। भीतर की पीड़ा और कटाक्ष साथ-साथ चलते हैं: कल के शासक आज बिल्कुल बेसहारा हैं।
यही जाना कि कुछ न जाना हाए
सो भी इक उम्र में हुआ मालूम
Interpretation:
Rekhta AI
यह शेर बताता है कि जीवन भर की खोज के बाद जो सबसे बड़ा ‘ज्ञान’ मिलता है, वह अपनी अज्ञानता का एहसास है। “हाय” पछतावे और दुख को दिखाता है कि इतनी देर में यह बात खुली। दूसरी पंक्ति में “उम्र” उस लंबे समय का संकेत है जिसमें घमंड और पक्का भरोसा धीरे-धीरे टूटता है। भाव यह है कि अंत में विनम्रता ही सच्ची समझ बनकर रह जाती है।
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टैग : इल्म
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अमीर-ज़ादों से दिल्ली के मिल न ता-मक़्दूर
कि हम फ़क़ीर हुए हैं इन्हीं की दौलत से
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Rekhta AI
मीर तक़ी मीर इस शेर में अमीरी-गरीबी के बीच की दीवार दिखाते हैं। वक्ता कहता है कि अमीरों की संगत उसकी पहुँच से बाहर है, पर यह उसकी कमी नहीं, समाज की बेइंसाफी है। “उन्हीं की दौलत” में तंज़ है: जिनके पास बहुत है, उसी व्यवस्था ने दूसरों को खाली हाथ किया। भाव में दुख भी है और भीतर दबा हुआ आरोप भी।
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टैग : दिल्ली
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शर्त सलीक़ा है हर इक अम्र में
ऐब भी करने को हुनर चाहिए
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Rekhta AI
मीर तक़ी मीर कहते हैं कि हर काम की असली शर्त शिष्टता और समझदारी है। अगर कमी बताने का ढंग सही न हो, तो बात सुधार की जगह चोट बन जाती है। इसलिए आलोचना भी एक तरह की कला है, जिसमें नरमी, समय और सही शब्दों का ध्यान चाहिए।
उस के फ़रोग़-ए-हुस्न से झमके है सब में नूर
शम-ए-हरम हो या कि दिया सोमनात का
Interpretation:
Rekhta AI
मीर तक़ी मीर कहते हैं कि प्रिय के सौंदर्य का प्रकाश एक ही स्रोत से सब जगह फैलता है। हरम की शमा और सोमनाथ के दिए का साथ आना दिखाता है कि उजाला किसी एक धर्म-स्थान तक सीमित नहीं। दीपक-रूपक से भीतर की जागृति और सबमें एक ही चमक का भाव उभरता है।
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हमारे आगे तिरा जब किसू ने नाम लिया
दिल-ए-सितम-ज़दा को हम ने थाम थाम लिया
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प्रिय का नाम सुनते ही दबा हुआ दर्द फिर से उठ खड़ा होता है। वक्ता का दिल पहले ही चोट खाया हुआ है, इसलिए वह अपने भावों को बाहर आने से रोकने के लिए उसे बार-बार थामता है। “थामना” रोने, कांपने और टूट जाने को छुपाने का संकेत है। यह प्रेम की तड़प और संयम की लड़ाई को दिखाता है।
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वस्ल में रंग उड़ गया मेरा
क्या जुदाई को मुँह दिखाऊँगा
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Rekhta AI
कवि कहता है कि प्रिय के साथ रहते हुए भी उसका रंग-रूप, साहस और जीने की ऊर्जा घट गई। जब मिलन ही उसे इतना कमजोर कर गया, तो वियोग का सामना करना और कठिन होगा। “मुँह दिखाना” का अर्थ है दर्द को झेलने की हिम्मत रखना और अपनी इज़्ज़त बचाए रखना। यह शेर प्रेम की थकान और आने वाले अलगाव के डर को व्यक्त करता है।
इश्क़ माशूक़ इश्क़ आशिक़ है
यानी अपना ही मुब्तला है इश्क़
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में इश्क़ को एक ऐसी शक्ति बताया गया है जो खुद ही प्रेमी भी बनती है और प्रिय भी। इसलिए तड़प का कारण कोई बाहर का व्यक्ति नहीं, इश्क़ की अपनी प्रकृति है। भाव यह है कि इश्क़ अपना ही दर्द खुद पैदा करता है और उसी में डूबा रहता है।
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'मीर' बंदों से काम कब निकला
माँगना है जो कुछ ख़ुदा से माँग
Interpretation:
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यह शेर कहता है कि इंसानों से उम्मीद अक्सर पूरी नहीं होती, इसलिए सहारा और मदद के लिए सबसे भरोसेमंद जगह ईश्वर है। इसमें बार-बार मिली निराशा की टीस भी है और एक सीख भी कि मांगना हो तो उसी से मांगो जो सब पर काबू रखता है। भाव यह है कि लोगों पर नहीं, प्रार्थना और भरोसे पर टिके रहो।
मुझ को शायर न कहो 'मीर' कि साहब मैं ने
दर्द ओ ग़म कितने किए जम्अ तो दीवान किया
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में मीर कविता को प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि सहा हुआ दुख मानते हैं। ‘दीवान’ यहाँ रचनाओं की किताब से अधिक, दर्द-ग़म का जमा हुआ खजाना है। भाव यह है कि उनकी शायरी जीवन के आघातों से निकली है, इसलिए वे खुद को बस दुख का संग्रहकर्ता कहते हैं। निजी पीड़ा कला में बदल जाती है।
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टैग : शेर
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ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत
दिल लगा कर हम तो पछताए बहुत
Interpretation:
Rekhta AI
इस शेर में प्रेम का नतीजा दुख के रूप में सामने आता है: ज़ख़्म ताज़ा चोट हैं और दाग़ वही चोट के गहरे, टिके हुए निशान। वक्ता कहता है कि उसने दिल लगाया, पर बदले में राहत नहीं मिली—सिर्फ़ नुकसान और पछतावा बढ़ता गया। भाव यह है कि प्रेम की कीमत बहुत भारी पड़ी।
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जाए है जी नजात के ग़म में
ऐसी जन्नत गई जहन्नम में
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यह शेर कड़वी विडंबना दिखाता है कि मुक्ति की चाह भी सुकून नहीं देती, बल्कि दुख बन जाती है। जिसे स्वर्ग जैसा समझा गया था, वह अनुभव में नरक जैसा निकला। भाव यह है कि आशा टूटने पर सबसे प्यारी कल्पना भी यातना लगने लगती है।
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अब आया ध्यान ऐ आराम-ए-जाँ इस ना-मुरादी में
कफ़न देना तुम्हें भूले थे हम अस्बाब-ए-शादी में
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यह शेर प्रेम की हार को बहुत तीखे रूपक में दिखाता है। कवि कहता है कि जिसे शादी की तैयारी समझा गया, वह असल में दुख और अंत की ओर जाने वाला रास्ता था। “कफ़न” को “शादी के सामान” के साथ रखकर वह बताता है कि खुशी की उम्मीद के नीचे मातम छिपा था। भाव का केंद्र पछतावा, विडंबना और टूटे हुए प्रेम का दर्द है।
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इश्क़ में जी को सब्र ओ ताब कहाँ
उस से आँखें लड़ीं तो ख़्वाब कहाँ
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मीर तक़ी मीर यहाँ प्रेम को ऐसी हालत बताते हैं जो इंसान का धैर्य और सहनशक्ति छीन लेती है। नज़रों का मिलना प्रेम-जागरण का संकेत है, जैसे भीतर की बेचैनी अचानक बढ़ जाए। इसके बाद रात का सुकून नहीं रहता—नींद उड़ जाती है और सपनों की गुंजाइश भी नहीं बचती। भाव का केंद्र तड़प और असहाय बेचैनी है।
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टैग : वैलेंटाइन डे
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कहा मैं ने कितना है गुल का सबात
कली ने ये सुन कर तबस्सुम किया
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यहाँ गुल यानी फूल सुंदरता और जीवन का संकेत है, जिसका टिकना बहुत थोड़ा है। कली की मुसकान में हल्का व्यंग्य और शांत स्वीकार दोनों हैं—वह जानती है कि उसका समय कम है, फिर भी वह खिलने से नहीं रुकती। भाव यह है कि क्षणभंगुरता के बीच भी जीने की नर्मी और साहस मौजूद है।
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टैग : बेसबाती
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मिरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में
तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया
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कवि कहता है कि उसके पास प्रेम निभाने की समझ थी, फिर भी प्रेम का अंत वैसा नहीं हुआ जैसा वह चाहता था। जीवन में उसे बार-बार हार और कमी ही मिली, उपलब्धि नहीं। इसमें आत्म-दोष और पीड़ा है, साथ ही यह विडंबना भी कि सच्ची कोशिश के बाद भी नतीजा असफलता रहा। कहीं न कहीं भाग्य के आगे बेबसी भी झलकती है।
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