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इंतिज़ार पर शेर

इंतिज़ार ख़ास अर्थों में

दर्दनाक होता है । इसलिए इस को तकलीफ़-देह कैफ़ियत का नाम दिया गया है । जीवन के आम तजरबात से अलग इंतिज़ार उर्दू शाइरी के आशिक़ का मुक़द्दर है । आशिक़ जहाँ अपने महबूब के इंतिज़ार में दोहरा हुआ जाता है वहीं उस का महबूब संग-दिल ज़ालिम, ख़ुद-ग़रज़, बे-वफ़ा, वादा-ख़िलाफ़ और धोके-बाज़ होता है । इश्क़ और प्रेम के इस तय-शुदा परिदृश्य ने उर्दू शाइरी में नए-नए रूपकों का इज़ाफ़ा किया है और इंतिज़ार के दुख को अनन्त-दुख में ढाल दिया है । यहाँ प्रस्तुत संकलन को पढ़िए और इंतिज़ार की अलग-अलग कैफ़ियतों को महसूस कीजिए ।

माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं

तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतिज़ार देख

मैं मानता हूँ कि मैं तुम्हें देखने के योग्य नहीं हूँ।

लेकिन मेरा लगाव देखो और मेरा इंतज़ार देखो।

वक्ता अपनी अयोग्यता स्वीकार करके विनम्रता दिखाता है, पर अपनी सच्ची चाह और लगातार प्रतीक्षा को अपने पक्ष में रखता है। वह कहता है कि मिलने की पात्रता सही, मेरी लगन तो देखी जाए। यहाँ “दीद” केवल देखना नहीं, बल्कि निकटता और कृपा का संकेत है। भाव का केंद्र तड़प, भक्ति-सा समर्पण और आशा है।

अल्लामा इक़बाल

ये थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता

अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

हमारे नसीब में यह नहीं लिखा था कि हमें अपने प्रियतम से मिलन प्राप्त होता।

अगर हम और ज़्यादा दिन ज़िंदा रहते, तो भी बस उनका इंतज़ार ही करते रहते।

शायर का कहना है कि प्रेमी से मिलन उनकी किस्मत में था ही नहीं। उन्हें अपनी मौत का या जीवन के छोटा होने का कोई अफ़सोस नहीं है, क्योंकि अगर ज़िंदगी लंबी होती तो भी मिलन नहीं होता, बस इंतज़ार का दुख और लंबा खिंच जाता। यह शेर नाकामी को स्वीकार करने की बात करता है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

इक रात वो गया था जहाँ बात रोक के

अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के

फ़रहत एहसास

वो रहे हैं वो आते हैं रहे होंगे

शब-ए-फ़िराक़ ये कह कर गुज़ार दी हम ने

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

Rekhta AI Explanation

इस शे’र का मिज़ाज ग़ज़ल के पारंपरिक स्वभाव के समान है। चूँकि फ़ैज़ ने प्रगतिशील विचारों के प्रतिनिधित्व में भी उर्दू छंदशास्त्र की परंपरा का पूरा ध्यान रखा इसलिए उनकी रचनाओं में प्रतीकात्मक स्तर पर प्रगतिवादी सोच दिखाई देती है इसलिए उनकी शे’री दुनिया में और भी संभावनाएं मौजूद हैं। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण ये मशहूर शे’र है। बाद-ए-नौ-बहार के मायने नई बहार की हवा है। पहले इस शे’र की व्याख्या प्रगतिशील विचार को ध्यान मे रखते हुए करते हैं। फ़ैज़ की शिकायत ये रही है कि क्रांति होने के बावजूद शोषण की चक्की में पिसने वालों की क़िस्मत नहीं बदलती। इस शे’र में अगर बाद-ए-नौबहार को क्रांति का प्रतीक मान लिया जाये तो शे’र का अर्थ ये बनता है कि गुलशन (देश, समय आदि) का कारोबार तब तक नहीं चल सकता जब तक कि क्रांति अपने सही मायने में नहीं आती। इसीलिए वो क्रांति या परिवर्तन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि जब तुम प्रगट हो जाओगे तब फूलों में नई बहार की हवा ताज़गी लाएगी। और इस तरह से चमन का कारोबार चलेगा। दूसरे शब्दों में वो अपने महबूब से कहते हैं कि तुम अब भी जाओ ताकि गुलों में नई बहार की हवा रंग भरे और चमन खिल उठे।

शफ़क़ सुपुरी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तेरे आने की क्या उमीद मगर

कैसे कह दूँ कि इंतिज़ार नहीं

तुम्हारे आने की ज़्यादा आशा तो नहीं है।

फिर भी मैं कैसे कह दूँ कि मैं प्रतीक्षा नहीं कर रहा?

यहाँ मन मान लेता है कि मिलने की संभावना कम है, पर दिल इंतज़ार छोड़ नहीं पाता। शेर की खूबी इसी विरोध में है: उम्मीद कम होते हुए भी प्रतीक्षा बनी रहती है। प्रेम की बेबसी और अटूट लगाव इसकी भावनात्मक धुरी है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

कोई वा'दा कोई यक़ीं कोई उमीद

मगर हमें तो तिरा इंतिज़ार करना था

तुमने कोई वादा किया, भरोसा दिया, कोई उम्मीद छोड़ी।

फिर भी मुझे तुम्हारा इंतज़ार ही करते रहना था।

यह शेर प्रेम की मजबूरी और समर्पण को दिखाता है: सामने से वादा है, भरोसा, उम्मीद—फिर भी मन रुक नहीं पाता और प्रतीक्षा करता रहता है। पहली पंक्ति की बार-बार की “न” खालीपन और टूटती आशा को गहरा करती है, और दूसरी पंक्ति में “करना था” प्रतीक्षा को जैसे भाग्य बना देता है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

कब ठहरेगा दर्द दिल कब रात बसर होगी

सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ये कैसा नश्शा है मैं किस अजब ख़ुमार में हूँ

तू के जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ

मुनीर नियाज़ी

ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर

वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वो आएगा हमें मालूम था इस शाम भी

इंतिज़ार उस का मगर कुछ सोच कर करते रहे

परवीन शाकिर

जान-लेवा थीं ख़्वाहिशें वर्ना

वस्ल से इंतिज़ार अच्छा था

जौन एलिया

बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ

कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मिरा इंतिज़ार कर

मुझे जन्नत के बाग़ से निकलकर सफ़र पर जाने का हुक्म क्यों मिला था?

दुनिया का काम बहुत लंबा है, अब तुम मेरा इंतज़ार करना।

कवि जन्नत जैसी सुख-शांति से दूर भेजे जाने का कारण पूछता है और इसे जीवन-यात्रा का रूपक बनाता है। यहाँ सफ़र का अर्थ है धरती पर मनुष्य की जिम्मेदारी और संघर्ष। दूसरे चरण में वह अपने प्रिय/अपने असली ठिकाने से कहता है कि काम लंबा है, इसलिए धैर्य रखो। भाव में बिछोह की कसक के साथ अपना कर्तव्य पूरा करने का संकल्प है।

अल्लामा इक़बाल

मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा

ये हादसा था कि मैं उम्र भर सफ़र में रहा

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं लौटने के इरादे से जा रहा हूँ मगर

सफ़र सफ़र है मिरा इंतिज़ार मत करना

साहिल सहरी नैनीताली

ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया

तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया

मैंने बड़ी भूल की कि तुम्हारे वादे पर भरोसा कर लिया।

मैं पूरी रात ऐसे इंतज़ार करता रहा जैसे क़यामत आने वाली हो।

यह शेर अपने ही भरोसे पर पछतावा और आत्म-तिरस्कार दिखाता है। वादा पूरा होने से इंतज़ार इतना भारी और लंबा लगता है कि उसे “क़यामत” जैसा कहा गया है। यहाँ क़यामत अंत-काल नहीं, बल्कि मन की घबराहट, टूटन और निराशा का रूपक है।

दाग़ देहलवी

जानता है कि वो आएँगे

फिर भी मसरूफ़-ए-इंतिज़ार है दिल

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

वो चाँद कह के गया था कि आज निकलेगा

तो इंतिज़ार में बैठा हुआ हूँ शाम से मैं

फ़रहत एहसास

सौ चाँद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी

तुम आए तो इस रात की औक़ात बनेगी

जाँ निसार अख़्तर

जिस की आँखों में कटी थीं सदियाँ

उस ने सदियों की जुदाई दी है

गुलज़ार

मुझ को ये आरज़ू वो उठाएँ नक़ाब ख़ुद

उन को ये इंतिज़ार तक़ाज़ा करे कोई

असरार-उल-हक़ मजाज़

बे-ख़ुदी ले गई कहाँ हम को

देर से इंतिज़ार है अपना

अपने-आप से बेखबर होकर हम पता नहीं कहाँ भटक गए।

हमारी अपनी ही पहचान बहुत देर से हमारा इंतज़ार कर रही है।

इस शे’र में ‘बेख़ुदी’ ऐसी हालत है जो इंसान को उसके ही केंद्र से दूर ले जाती है। कहने वाला इतना खो गया है कि उसका ‘अपना’ यानी उसका असली रूप उससे अलग होकर प्रतीक्षा कर रहा है। भाव भीतर की खालीपन, भटकाव और देर से होश में आने का है। दर्द यह है कि आदमी खुद से ही बिछड़ जाता है।

मीर तक़ी मीर

कौन आएगा यहाँ कोई आया होगा

मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा

कैफ़ भोपाली

मैं ने समझा था कि लौट आते हैं जाने वाले

तू ने जा कर तो जुदाई मिरी क़िस्मत कर दी

अहमद नदीम क़ासमी

शब-ए-इंतिज़ार की कश्मकश में पूछ कैसे सहर हुई

कभी इक चराग़ जला दिया कभी इक चराग़ बुझा दिया

मजरूह सुल्तानपुरी

इक उम्र कट गई है तिरे इंतिज़ार में

ऐसे भी हैं कि कट सकी जिन से एक रात

मैंने तुम्हारे इंतज़ार में पूरी ज़िंदगी बिता दी।

पर कुछ लोग ऐसे हैं जिनके साथ एक रात भी नहीं कटती।

इस शेर में ‘उम्र’ और ‘रात’ के विरोध से भावना की तीव्रता दिखती है। प्रिय के इंतज़ार में जीवन भी बीत जाता है, क्योंकि वहाँ चाह और लगाव है; लेकिन कुछ साथ ऐसे होते हैं जो एक रात में ही असह्य लगते हैं। यही तुलना प्रेम की दृढ़ता और नापसंद की बेचैनी को उजागर करती है।

फ़िराक़ गोरखपुरी

आप का ए'तिबार कौन करे

रोज़ का इंतिज़ार कौन करे

अब आपकी बात पर भला कौन विश्वास करे?

हर रोज़ आपकी राह कौन देखे?

वक्ता प्रिय की बार-बार की बात टालने या वादा निभाने से टूट चुका है, इसलिए भरोसे पर सवाल करता है। दूसरे मिसरे में रोज़ का इंतज़ार एक थकाने वाली आदत बनकर उभरता है। यहाँ ‘विश्वास’ रिश्ते की नींव है और ‘इंतज़ार’ उम्मीद—दोनों धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं। भाव शंका और निराशा का है।

दाग़ देहलवी

कहीं वो के मिटा दें इंतिज़ार का लुत्फ़

कहीं क़ुबूल हो जाए इल्तिजा मेरी

हसरत जयपुरी

इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं

आने वाले बरसों ब'अद भी आते हैं

ज़ेहरा निगाह

हमें भी आज ही करना था इंतिज़ार उस का

उसे भी आज ही सब वादे भूल जाने थे

आशुफ़्ता चंगेज़ी

अब इन हुदूद में लाया है इंतिज़ार मुझे

वो भी जाएँ तो आए ए'तिबार मुझे

ख़ुमार बाराबंकवी

अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहाँ

शाम गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या

मुनीर नियाज़ी

आने में सदा देर लगाते ही रहे तुम

जाते रहे हम जान से आते ही रहे तुम

रासिख़ अज़ीमाबादी

कोई इशारा दिलासा कोई व'अदा मगर

जब आई शाम तिरा इंतिज़ार करने लगे

वसीम बरेलवी

तमाम जिस्म को आँखें बना के राह तको

तमाम खेल मोहब्बत में इंतिज़ार का है

मुनव्वर राना

काव काव-ए-सख़्त-जानी हाए-तन्हाई पूछ

सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का

मेरे अकेलेपन की तड़प और उसे सहने की मजबूरी मत पूछो।

मेरे लिए सुबह से शाम तक पहुँच जाना भी बहुत ही कठिन काम है।

इस शे’र में अकेलापन एक ऐसी पीड़ा बनकर आता है जो मन को लगातार बेचैन रखती है। शायर बताता है कि इस हालत में जीना ही बड़ा धीरज माँगता है, और समय का गुजरना भी भारी लगता है। सुबह से शाम तक का साधारण सा सफ़र भी असंभव-सा प्रतीत होता है; इसी को “जू-ए-शीर” यानी बेहद कठिन काम के रूपक से कहा गया है।

मिर्ज़ा ग़ालिब

जिसे आने की क़स्में मैं दे के आया हूँ

उसी के क़दमों की आहट का इंतिज़ार भी है

जावेद नसीमी

बारहा तेरा इंतिज़ार किया

अपने ख़्वाबों में इक दुल्हन की तरह

परवीन शाकिर

कोई आया आएगा लेकिन

क्या करें गर इंतिज़ार करें

कोई नहीं आया, और लगता है कि अब कोई आएगा भी नहीं।

लेकिन अगर इंतज़ार किए बिना रहा जाए, तो फिर क्या करें?

यह शेर मन के दो हिस्सों को दिखाता है: दिमाग़ कहता है कि अब कोई आने वाला नहीं, पर दिल इंतज़ार छोड़ नहीं पाता। इंतज़ार यहाँ तर्क नहीं, प्रेम की मजबूरी है। भावनात्मक केंद्र बेबस उम्मीद है—सब कुछ जानकर भी प्रतीक्षा करते रहना।

फ़िराक़ गोरखपुरी

मुद्दत से ख़्वाब में भी नहीं नींद का ख़याल

हैरत में हूँ ये किस का मुझे इंतिज़ार है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

है ख़ुशी इंतिज़ार की हर दम

मैं ये क्यूँ पूछूँ कब मिलेंगे आप

निज़ाम रामपुरी

क़ासिद पयाम-ए-शौक़ को देना बहुत तूल

कहना फ़क़त ये उन से कि आँखें तरस गईं

जलील मानिकपूरी

ता फिर इंतिज़ार में नींद आए उम्र भर

आने का अहद कर गए आए जो ख़्वाब में

ताकि फिर मुझे इंतज़ार के कारण पूरी ज़िंदगी नींद आए।

वे जो सपने में आए थे, फिर से आने का वादा करके चले गए।

शायर कहता है कि महबूब सपने में आया और जाते समय फिर आने का वादा कर गया। यह वादा शायर की नींद उड़ाने का कारण बन गया है, क्योंकि अब वह इंतज़ार में जागता रहेगा। विडंबना यह है कि जब उसे नींद नहीं आएगी, तो सपना नहीं आएगा, और सपने के बिना महबूब से दोबारा मुलाक़ात नहीं हो पाएगी।

मिर्ज़ा ग़ालिब

मौत का इंतिज़ार बाक़ी है

आप का इंतिज़ार था रहा

फ़ानी बदायुनी

आधी से ज़ियादा शब-ए-ग़म काट चुका हूँ

अब भी अगर जाओ तो ये रात बड़ी है

साक़िब लखनवी

तमाम उम्र तिरा इंतिज़ार हम ने किया

इस इंतिज़ार में किस किस से प्यार हम ने किया

हफ़ीज़ होशियारपुरी

ये इंतिज़ार नहीं शम्अ है रिफ़ाक़त की

इस इंतिज़ार से तन्हाई ख़ूब-सूरत है

अरशद अब्दुल हमीद

किस किस तरह की दिल में गुज़रती हैं हसरतें

है वस्ल से ज़ियादा मज़ा इंतिज़ार का

ताबाँ अब्दुल हई

दरवाज़ा खुला है कि कोई लौट जाए

और उस के लिए जो कभी आया गया हो

अतहर नफ़ीस

मरने के वक़्त भी मिरी आँखें खुली रहीं

आदत जो पड़ गई थी तिरे इंतिज़ार की

अज्ञात
बोलिए