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Momin Khan Momin's Photo'

मोमिन ख़ाँ मोमिन

1800 - 1852 | दिल्ली, भारत

ग़ालिब और ज़ौक़ के समकालीन। वह हकीम, ज्योतिषी और शतरंज के खिलाड़ी भी थे। कहा जाता है मिर्ज़ा ग़ालीब ने उनके शेर "तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नही होता" पर अपना पूरा दीवान देने की बात कही थी

ग़ालिब और ज़ौक़ के समकालीन। वह हकीम, ज्योतिषी और शतरंज के खिलाड़ी भी थे। कहा जाता है मिर्ज़ा ग़ालीब ने उनके शेर "तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नही होता" पर अपना पूरा दीवान देने की बात कही थी

मोमिन ख़ाँ मोमिन के शेर

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तुम मिरे पास होते हो गोया

जब कोई दूसरा नहीं होता

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर बताता है कि अकेलेपन में प्रिय की उपस्थिति सबसे अधिक महसूस होती है। “गोया” से संकेत मिलता है कि यह पास होना सच भी हो सकता है और मन की कल्पना या याद भी। जब आसपास कोई नहीं रहता, तो वही याद दिल को सहारा देती है, और उसी से तड़प भी झलकती है।

'उम्र सारी तो कटी 'इश्क़-ए-बुताँ में 'मोमिन'

आख़िरी वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमाँ होंगे

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में कवि अपने ही जीवन पर कड़ी आत्म-ग्लानि जताता है और अंत समय का डर दिखता है। “इश्क़-ए-बुताँ” दुनिया की सुंदरता और भटकाने वाली चाहतों का संकेत है, जो ईमान से दूर कर देती हैं। वह कहता है कि जब सारी उम्र गलत लगाव में गई, तो मौत के समय की आख़िरी तौबा किस काम की। भाव का केंद्र पछतावा और आत्म-व्यंग्य है।

तुम हमारे किसी तरह हुए

वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता

Interpretation: Rekhta AI

वक्ता का दुख यह है कि बहुत कोशिश के बाद भी प्रेम का साथ नहीं मिला। दूसरी पंक्ति कहती है कि दुनिया में तो सब कुछ हो सकता है, लेकिन यही एक बात नहीं हो पाई। इसमें किस्मत के आगे बेबसी और अधूरे प्रेम की तड़प झलकती है।

वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि याद हो

वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि याद हो

Interpretation: Rekhta AI

कवि प्रिय से पूछता है कि क्या उसे वह पुराना रिश्ता और आपसी समझ अब भी याद है। “क़रार” यहाँ स्थिरता और तय हुए संबंध का संकेत है, और “वादा निभाह” निष्ठा से साथ देने की प्रतिज्ञा है। “याद हो कि याद हो” की बार-बार ध्वनि में शिकायत भी है और टूटन भी—जैसे भूल जाना ही बेवफ़ाई हो। यह शेर प्रेम को याद और वफ़ादारी की कसौटी पर रखता है।

थी वस्ल में भी फ़िक्र-ए-जुदाई तमाम शब

वो आए तो भी नींद आई तमाम शब

Interpretation: Rekhta AI

इस दोहे में प्रेम की बेचैनी दिखती है: पास होने पर भी मन बिछड़ने की आशंका से घिरा रहता है। मिलन का सुख डर को मिटा नहीं पाता, बल्कि डर और तेज हो जाता है। इसी कारण प्रिय के आने पर भी रात भर नींद नहीं आती।

क्या जाने क्या लिखा था उसे इज़्तिराब में

क़ासिद की लाश आई है ख़त के जवाब में

Interpretation: Rekhta AI

इस शे’र में प्रेम का पत्र-व्यवहार अचानक दुःखद घटना बन जाता है: लिखने वाले की बेचैनी भी रहस्य रह जाती है और जवाब मृत्यु के रूप में मिलता है। दूत की लाश किस्मत की कठोरता और टूटे हुए संवाद का प्रतीक है। भाव में डर, असहायता और गहरी जुदाई झलकती है।

मैं भी कुछ ख़ुश नहीं वफ़ा कर के

तुम ने अच्छा किया निबाह की

Interpretation: Rekhta AI

वक्ता कहता है कि निष्ठा निभाकर भी मन को सुकून नहीं मिला, बल्कि खालीपन और कड़वाहट रह गई। इसलिए वह विडंबना में कहता है कि तुमने साथ नहीं निभाया तो बेहतर ही हुआ, क्योंकि चलती हुई चाहत दर्द और बढ़ाती। यह शेर प्रेम की टूटन, मोहभंग और स्वीकार का तीखा मिश्रण है।

शब जो मस्जिद में जा फँसे 'मोमिन'

रात काटी ख़ुदा ख़ुदा कर के

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर हल्के व्यंग्य और बेचैनी का मेल है। मस्जिद में “ख़ुदा ख़ुदा” कहना ऊपर से भक्ति लगता है, पर अंदर से डर और घबराहट भी झलकती है। “रात काटी” बताता है कि समय बहुत मुश्किल से गुज़रा। इसी तरह प्रार्थना और मजबूरी एक साथ सामने आती हैं।

माँगा करेंगे अब से दुआ हिज्र-ए-यार की

आख़िर तो दुश्मनी है असर को दुआ के साथ

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ कवि व्यंग्य में अपनी बेबसी दिखाता है: जब प्रार्थना का फल अक्सर उल्टा निकलता है, तो वह जानबूझकर विरह ही माँगने की बात करता है। “दुश्मनी” का अर्थ है इच्छा और नतीजे के बीच टकराव—जैसे भाग्य साथ दे रहा हो। भाव-केन्द्र में टूटन, डर और कटु irony है।

चल दिए सू-ए-हरम कू-ए-बुताँ से 'मोमिन'

जब दिया रंज बुतों ने तो ख़ुदा याद आया

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में ‘मूर्ति/बुत’ दुनिया के मोह और प्रिय की पूजा का रूपक है, जबकि ‘हरम’ आस्था और पवित्र शरण का संकेत है। जब जिसको चाहा उसी से चोट मिली, तो मन ईश्वर की ओर मुड़ा। दुख यहाँ चेतना जगाने वाला कारण बनता है और प्रेम से विरक्ति का रास्ता दिखाता है। भाव-केन्द्र में टूटन, पछतावा और फिर विश्वास की ओर लौटना है।

रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह

अटका कहीं जो आप का दिल भी मिरी तरह

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि प्रेम का दर्द एक दिन सामने वाले को भी उसी तरह रुलाएगा। “दिल का अटक जाना” उस लगाव का रूपक है जो छूटता नहीं और इंसान को आगे बढ़ने नहीं देता, इसलिए रोना लंबा खिंचता है। इसमें चेतावनी भी है और हल्का-सा व्यंग्य भी कि समझ तब आएगी जब चोट अपनी लगे। भाव-केन्द्र वियोग की तड़प और मन की बेबसी है।

उलझा है पाँव यार का ज़ुल्फ़-ए-दराज़ में

लो आप अपने दाम में सय्याद गया

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ सुंदर उलटफेर है: लंबी लटें जाल बन जाती हैं और जो पकड़ने वाला था वही पकड़ा जाता है। संकेत यह है कि प्रेम और सौंदर्य के सामने नियंत्रण का घमंड टिक नहीं पाता। भाव में हल्की-सी शरारत है और भीतर समर्पण की कसक भी।

वो आए हैं पशेमाँ लाश पर अब

तुझे ज़िंदगी लाऊँ कहाँ से

Interpretation: Rekhta AI

यह दोहा देर से आए पछतावे की बेकारियत दिखाता है: जब सब खत्म हो गया, तब किसी का शर्मिंदा होकर आना किसी काम का नहीं। कवि ‘ज़िंदगी’ को संबोधित करके मानो उसे लौटाने की बात करता है, पर मौत की सच्चाई उसे रोक देती है। लाश के पास खड़ा पछतावा समय चूक जाने का रूपक है। भाव में शिकायत, दुख और असहायता है।

उस ग़ैरत-ए-नाहीद की हर तान है दीपक

शोला सा लपक जाए है आवाज़ तो देखो

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर गायिका की आवाज़ की तेज़ असरदार ताक़त को आग के रूपक से दिखाता है। “दीपक” यहाँ उस राग की ओर संकेत है जिसके बारे में माना जाता है कि वह दीप जलाने जैसा प्रभाव पैदा करता है। “शुक्र-सी शान” से सुंदरता और ऊँचाई का भाव आता है। भाव-केन्द्र है हैरत और दीवानगी: आवाज़ सुनते ही भीतर ताप और चमक जग उठती है।

कभी हम में तुम में भी चाह थी कभी हम से तुम से भी राह थी

कभी हम भी तुम भी थे आश्ना तुम्हें याद हो कि याद हो

Interpretation: Rekhta AI

मोमिन ख़ाँ मोमिन इस दोहे में बीती नज़दीकी को याद करके आज की दूरी का दर्द दिखाते हैं। ‘चाह’ दिल की चाहत है और ‘राह’ का अर्थ है साथ आने-जाने, मिलने का मौका। आख़िर में हल्की-सी कसक है कि शायद सामने वाला भूल गया हो, पर बोलने वाला नहीं भूला। भाव का केंद्र खोए हुए संबंध और असमान याद है।

आप की कौन सी बढ़ी इज़्ज़त

मैं अगर बज़्म में ज़लील हुआ

Interpretation: Rekhta AI

वक्ता प्रिय से उलाहना देता है कि मेरी सबके सामने हुई बेइज़्ज़ती से तुम्हारा मान नहीं बढ़ता। ‘महफ़िल’ समाज की नज़र और दबाव का प्रतीक है, जहाँ अपमान गहरा लगता है। भाव यह है कि किसी को गिराकर ऊँचा नहीं हुआ जा सकता—दर्द मेरा बढ़ा, इज़्ज़त तुम्हारी नहीं।

किस पे मरते हो आप पूछते हैं

मुझ को फ़िक्र-ए-जवाब ने मारा

Interpretation: Rekhta AI

प्रिय का सीधा सवाल प्रेमी को असमंजस में डाल देता है। वह सच कहे तो संकोच, कहे तो डर—इसलिए सबसे बड़ी पीड़ा ‘जवाब कैसे दूँ’ वाली चिंता बन जाती है। “मारा” यहाँ वास्तविक मौत नहीं, बल्कि भीतर से टूट जाने का संकेत है। शेर में प्रेम की कसक के साथ चतुराई भी झलकती है।

किसी का हुआ आज कल था किसी का

है तू किसी का होगा किसी का

Interpretation: Rekhta AI

मोमिन ख़ाँ मोमिन इस दोहे में रिश्तों की अस्थिरता और लगाव की बदलती पहचान बताते हैं। “किसी का” बार-बार आकर यह दिखाता है कि प्रेम को मालिकाना समझना एक भ्रम है। वक्त के साथ लोग और संबंध बदलते हैं, इसलिए किसी पर स्थायी अधिकार नहीं होता। भाव में कड़वाहट भी है और एक शांत-सी स्वीकारोक्ति भी।

ठानी थी दिल में अब मिलेंगे किसी से हम

पर क्या करें कि हो गए नाचार जी से हम

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर पक्के संकल्प और मजबूरी के टकराव को दिखाता है। बोलने वाला कहता है कि उसने लोगों से दूर रहने का निश्चय किया था, पर जीवन/दिल की जरूरतें उसे फिर खींच लाती हैं। दुख या चोट के बाद भी इंसान पूरी तरह अलग नहीं रह पाता। भावनात्मक सार बेबसी और अंदर की तड़प है।

उस नक़्श-ए-पा के सज्दे ने क्या क्या किया ज़लील

मैं कूचा-ए-रक़ीब में भी सर के बल गया

Interpretation: Rekhta AI

कदमों का निशान यहाँ प्रिय की निशानी है और सजदा अत्यधिक भक्ति का प्रतीक। कवि कहता है कि इस भक्ति ने उसे बार-बार अपमानित किया, क्योंकि उसने अपना मान-सम्‍मान छोड़ दिया। प्रतिद्वंद्वी की गली में सिर के बल जाना बताता है कि प्रेम की सनक ने उसकी सीमाएँ और स्वाभिमान दोनों तोड़ दिए। भाव का सार है बेबसी भरा समर्पण और अपनी ही हालत पर कड़वी समझ।

है कुछ तो बात 'मोमिन' जो छा गई ख़मोशी

किस बुत को दे दिया दिल क्यूँ बुत से बन गए हो

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर बताता है कि मौन किसी गहरे दुख या चोट का संकेत है। ‘बुत’ यहाँ ऐसे प्रिय का रूपक है जो सुंदर तो है पर जवाब नहीं देता, इसलिए प्रेमी भीतर से टूटकर चुप हो जाता है। कवि हैरानी से पूछता है कि किसके प्रेम ने तुम्हें इतना जड़ कर दिया कि तुम बोलने-सुनने से भी दूर, पत्थर जैसे हो गए।

हाल-ए-दिल यार को लिखूँ क्यूँकर

हाथ दिल से जुदा नहीं होता

Interpretation: Rekhta AI

कवि अपने मन की हालत प्रिय तक पहुँचाना चाहता है, पर भावनाओं की तीव्रता उसे लिखने नहीं देती। हाथ लिखने-करने की क्षमता का संकेत है और दिल दुख प्रेम की पकड़ का। भाव इतने भारी हैं कि हाथ जैसे दिल पर ही रुका रहता है और पत्र नहीं बन पाता। इस तरह प्रेम की तड़प और बेबसी दोनों साथ उभरती हैं।

नावक-अंदाज़ जिधर दीदा-ए-जानाँ होंगे

नीम-बिस्मिल कई होंगे कई बे-जाँ होंगे

Interpretation: Rekhta AI

शेर में प्रिय की नज़र को तीर बना दिया गया है और उसे तीर चलाने वाला कहा गया है। मतलब यह कि उसकी एक झलक कई दिलों पर एक साथ वार करती है। कुछ प्रेमी दर्द में तड़पते रह जाते हैं, और कुछ पूरी तरह टूटकर खत्म हो जाते हैं। भाव यह है कि प्रेमी उसकी बेपरवाह ख़ूबसूरती के सामने बेबस है।

हँस हँस के वो मुझ से ही मिरे क़त्ल की बातें

इस तरह से करते हैं कि गोया करेंगे

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ ‘क़त्ल’ बहुत गहरी चोट देने का रूपक है। प्रिय व्यक्ति हँसी में वही बात कहकर उसे हल्का दिखाता है, पर भीतर धमकी और कठोरता छिपी है। इसी विरोधाभास—मुस्कान में छुरी—से वक्ता का दर्द बढ़ जाता है और वह बेबस महसूस करता है।

करो अब निबाह की बातें

तुम को मेहरबान देख लिया

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि अब साथ निभाने के वादे बेकार हैं, क्योंकि सामने वाले का सच समझ में गया है। 'मेहरबान' संबोधन में व्यंग्य है—जिससे उम्मीद थी वही चोट दे गया। यह शेर मोहभंग के उस पल को दिखाता है जहाँ समझ आने के बाद रिश्ते की बातों पर भरोसा नहीं बचता।

तू कहाँ जाएगी कुछ अपना ठिकाना कर ले

हम तो कल ख़्वाब-ए-अदम में शब-ए-हिज्राँ होंगे

Interpretation: Rekhta AI

कवि प्रिय से कहता है कि वह अपने लिए कोई सहारा और जगह तय कर ले, क्योंकि बिछड़ना करीब है। वह अपनी स्थिति को “अदम” के सपने से जोड़कर दिखाता है—जैसे कल वह अस्तित्व से ही उतर जाएगा। “विरह की रात” बन जाना बताता है कि उसके जाने के बाद केवल खालीपन और तड़प बचेंगे। यह पंक्तियाँ प्रेम के साथ-साथ अंतिम विदाई की चेतावनी भी हैं।

चारा-ए-दिल सिवाए सब्र नहीं

सो तुम्हारे सिवा नहीं होता

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि दिल की पीड़ा का एक ही सहारा है—सब्र। लेकिन यह सब्र भी प्रिय के बिना टिकता नहीं; उनके बिना चैन और रास्ता दोनों खो जाते हैं। भाव यह है कि प्रेम में सहना भी पड़ता है और प्रिय की कमी हर बात को अधूरा बना देती है।

डरता हूँ आसमान से बिजली गिर पड़े

सय्याद की निगाह सू-ए-आशियाँ नहीं

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ कवि बताता है कि मन अक्सर गलत दिशा में डरता है: ऊपर से गिरती बिजली जैसी अनहोनी का भय, और दूसरी ओर वह शिकारी जिससे डर माना जाता है, पर उसकी नज़र घोंसले पर नहीं। “बिजली” अचानक आने वाली किस्मत की मार का संकेत है और “घोंसला” नाज़ुक घर/सुरक्षा का। भाव यह है कि चिंता हमें बड़े, दूर के खतरे दिखाती है और असली स्थिति धुंधली रह जाती है।

मज्लिस में मिरे ज़िक्र के आते ही उठे वो

बदनामी-ए-उश्शाक़ का एज़ाज़ तो देखो

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर दिखाता है कि प्रेमी का नाम सुनते ही प्रिय व्यक्ति का उठ जाना एक तरह की दूरी और लोक-लाज का संकेत है। कवि कटाक्ष के साथ कहता है कि प्रेम करने वालों के हिस्से में इज़्ज़त नहीं, बदनामी आती है—और उसी बदनामी को वह उलटा ‘सम्मान’ कहकर दिखाता है। भाव में दर्द भी है और तीखी विडंबना भी।

माशूक़ से भी हम ने निभाई बराबरी

वाँ लुत्फ़ कम हुआ तो यहाँ प्यार कम हुआ

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर प्रेम में बराबरी और लेन-देन की बात करता है। वक्ता कहता है कि वह अपने स्वाभिमान के साथ प्रेम निभाता है; अगर प्रिय की तरफ़ से रस, अपनापन और ध्यान कम हो जाए, तो वह भी अपना प्रेम कम कर देता है। “उधर–इधर” से दो तरफ़ों का तराज़ू बनता है। भाव यह है कि प्रेम पारस्परिक हो, एकतरफ़ा नहीं।

'मोमिन' ख़ुदा के वास्ते ऐसा मकाँ छोड़

दोज़ख़ में डाल ख़ुल्द को कू-ए-बुताँ छोड़

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर प्रेम की जगह—‘प्रिय की गली’—को सबसे ऊपर रखता है। कवि बढ़ा-चढ़ाकर कहता है कि स्वर्ग भी अगर दूर करे, तो उसे नरक मान लो, पर उस गली से अलग मत हो। स्वर्ग-नरक की छवि के सहारे वह दिखाता है कि प्रेम में साथ और निकटता ही सच्ची मंज़िल है। भावनात्मक केंद्र अटल लगाव और तड़पती विनती है।

बहर-ए-अयादत आए वो लेकिन क़ज़ा के साथ

दम ही निकल गया मिरा आवाज़-ए-पा के साथ

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ प्रेमी की मुलाक़ात राहत नहीं, बल्कि किस्मत की तीखी विडंबना बन जाती है, जैसे वह मौत को साथ लेकर आया हो। ‘कदमों की आहट’ आने की खुशी की निशानी है, पर वही निशानी जीवन के अंत का कारण बनती है। इसी टकराव में प्रेम, इंतज़ार और नश्वरता का दर्द एक साथ उभरता है।

क्या मिला अर्ज़-ए-मुद्दआ कर के

बात भी खोई इल्तिजा कर के

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर पछतावे की आवाज़ है: अपनी माँग रखने से कोई हासिल नहीं हुआ। उलटे बार-बार विनती करने से बोलने वाले की ‘बात’ यानी उसका मान-प्रतिष्ठा और प्रभाव घट गया। भाव यह है कि अस्वीकार के साथ आत्मसम्मान भी टूटता महसूस हुआ।

कल तुम जो बज़्म-ए-ग़ैर में आँखें चुरा गए

खोए गए हम ऐसे कि अग़्यार पा गए

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर उस चोट को दिखाता है जब प्रिय व्यक्ति सबके सामने नज़रें चुरा लेता है। “गैरों की महफ़िल” में यह टालना दूरी और उपेक्षा का साफ़ संकेत बन जाता है, जिससे प्रेमी भीतर से बिखर जाता है। वह इतना असहाय हो जाता है कि उसकी हालत पर पराए लोगों की नज़र पड़ती है और वे उसे अपने हिसाब से समझ लेते हैं। भाव-केन्द्र में ईर्ष्या, अपमान और टूटन एक साथ हैं।

मानूँगा नसीहत पर सुनता मैं तो क्या करता

कि हर हर बात में नासेह तुम्हारा नाम लेता था

Interpretation: Rekhta AI

कवि व्यंग्य में कहता है कि ऐसी नसीहत मानना मुश्किल था, क्योंकि समझाने वाला हर वाक्य में प्रिय का नाम जोड़ देता था। इससे उपदेश मदद नहीं, बल्कि चुभन बन जाता है और मन और ज़्यादा अड़ जाता है। शेर में प्रेम की हठ और सलाह देने वाले की पक्षपातपूर्ण बातों की कसक झलकती है।

ग़ैरों पे खुल जाए कहीं राज़ देखना

मेरी तरफ़ भी ग़म्ज़ा-ए-ग़म्माज़ देखना

Interpretation: Rekhta AI

कवि प्रिय से कहता है कि प्रेम की बात छिपी रहे, वरना लोग समझ जाएंगे और बात फैल जाएगी। “ग़म्ज़ा-ए-ग़म्माज़” ऐसी नज़र है जो इशारा भी करती है और मन की बात खोल भी देती है। वह चाहता है कि प्रिय उसे देखे, पर उसी नज़र से राज़ खुल जाने का डर भी है। भाव में चाह और सावधानी दोनों साथ हैं।

हो गया राज़-ए-इश्क़ बे-पर्दा

उस ने पर्दे से जो निकाला मुँह

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ घूँघट/परदा केवल चेहरे का ढकना नहीं, छिपाव का संकेत भी है। प्रिय का परदे से झाँकना इतना था कि प्रेम की बात सब पर प्रकट हो गई। छोटी-सी झलक ने भीतर छिपी तड़प को बाहर ला दिया। भाव यह है कि प्रेम छुपाते-छुपाते भी उजागर हो जाता है।

हो गए नाम-ए-बुताँ सुनते ही 'मोमिन' बे-क़रार

हम कहते थे कि हज़रत पारसा कहने को हैं

Interpretation: Rekhta AI

इस शे’र में दिखावटी धर्म-परायणता पर व्यंग्य है। “बुताँ” से संकेत आकर्षक चेहरों/प्रियजनों की ओर है, और नाम सुनते ही बेचैन होना छिपी हुई इच्छा को उजागर करता है। कवि कहता है कि जो अपने को बहुत पवित्र जताता है, उसकी पवित्रता केवल बातों तक सीमित है; असल में वह भी मोह के आगे डगमगा जाता है।

हम समझते हैं आज़माने को

उज़्र कुछ चाहिए सताने को

Interpretation: Rekhta AI

कवि प्रिय की कठोरता को सच्ची नाराज़गी नहीं, बल्कि प्रेम की “परीक्षा” मानता है। “बहाना” बताता है कि प्रिय जान-बूझकर कारण ढूँढ़कर तंग करता है, जैसे नख़रे में आनंद हो। भाव यह है कि शिकायत के साथ-साथ एक स्वीकार भी है: प्रेम में दर्द को भी परख की तरह सहना पड़ता है।

कुछ क़फ़स में इन दिनों लगता है जी

आशियाँ अपना हुआ बर्बाद क्या

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ कवि बताता है कि बंधन अब उसे जाना-पहचाना और सहने लायक लगने लगा है। “पिंजरा” मजबूरी और सीमाओं का संकेत है, जबकि “घोंसला” अपना घर, सुरक्षा और स्वाभाविक आज़ादी। दूसरे पंक्ति में वह खुद को दोष देकर पछतावा दिखाता है। भाव यह है कि जब अपना घर खुद उजड़ जाए, तो कैद भी आदत बन जाती है।

सोज़-ए-ग़म से अश्क का एक एक क़तरा जल गया

आग पानी में लगी ऐसी कि दरिया जल गया

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ दुख को आग की तरह बताया गया है जो आँसू जैसे पानी को भी जला दे। यह विरोधाभास दिखाता है कि दर्द इतना तीव्र है कि सामान्य नियम उलट जाते हैं। “पानी में आग” भीतर की बेचैनी का रूपक है जो राहत देने के बजाय और फैलती है, और उसका असर इतना बड़ा हो जाता है कि नदी भी जलती हुई लगती है।

इतनी कुदूरत अश्क में हैराँ हूँ क्या कहूँ

दरिया में है सराब कि दरिया सराब में

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ दुःख की गहराई को आँसुओं के “मैलापन” से बताया गया है, जैसे रोना भी मन को हल्का नहीं कर पाता। नदी सच्चाई और बहाव का संकेत है, और मृगतृष्णा भ्रम का। कवि दोनों को उलटकर कहता है कि अब असली और नकली की पहचान गड़बड़ा गई है। यह तीखी उलझन दिल के टूटने और भरोसे के डगमगाने की भावनात्मक तस्वीर है।

रह के मस्जिद में क्या ही घबराया

रात काटी ख़ुदा ख़ुदा कर के

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर बताता है कि डर और बेचैनी इतनी गहरी हो सकती है कि पूजा की जगह में भी चैन नहीं मिलता। ‘ख़ुदा ख़ुदा’ कहना यहाँ प्रार्थना भी है और घबराहट में मन को थामने का तरीका भी। भाव यह है कि इंसान रात भर अपने अंदर के डर से जूझता है और सहारा बस ईश्वर-स्मरण से मिलता है।

ताब-ए-नज़्ज़ारा नहीं आइना क्या देखने दूँ

और बन जाएँगे तस्वीर जो हैराँ होंगे

Interpretation: Rekhta AI

इस शेर में आईना अपने-आप को देखने और सौंदर्य के सामने सच से टकराने का प्रतीक है। वक्ता कहता है कि देखने वाले में इतना सामर्थ्य नहीं कि वह उस दृश्य को सह सके, इसलिए वह आईना दिखाने से रोकता है। ‘तस्वीर बन जाना’ का मतलब है हैरानी में ठिठक कर बिल्कुल स्थिर हो जाना। बात में संकोच भी है और सौंदर्य के असर का हल्का-सा अतिशयोक्ति भरा मज़ाक भी।

कर इलाज-ए-जोश-ए-वहशत चारागर

ला दे इक जंगल मुझे बाज़ार से

Interpretation: Rekhta AI

कवि अपनी भीतर की बेचैनी को रोग मानकर उपचार माँगता है, पर दवा नहीं—जगह माँगता है। उसके लिए बाज़ार भीड़, शोर और घुटन का रूप है, जबकि जंगल एकांत, खुलापन और सांस लेने की आज़ादी का प्रतीक। भाव यह है कि मन की व्याकुलता का सच्चा इलाज दुनिया की हलचल से दूर होना है।

साहब ने इस ग़ुलाम को आज़ाद कर दिया

लो बंदगी कि छूट गए बंदगी से हम

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ प्रिय को “मालिक” और प्रेमी को “गुलाम” कहा गया है, जहाँ गुलामी का मतलब प्रेम में स्वेच्छा से समर्पण है। जब मालिक ने “आज़ाद” किया, यानी साथ और अधिकार छीन लिया, तो प्रेमी का समर्पण ही टूट गया। इसलिए आज़ादी खुशी नहीं बनती, बल्कि खालीपन और विडंबना बनकर चुभती है।

है किस का इंतिज़ार कि ख़्वाब-ए-अदम से भी

हर बार चौंक पड़ते हैं आवाज़-ए-पा के साथ

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर इंतज़ार की इतनी गहरी हालत दिखाता है कि ‘ख़्वाब-ए-अदम’ यानी मृत्यु जैसी बेख़बरी भी दिल को सुकून नहीं देती। जैसे ही कदमों की हल्की-सी आहट सुनाई देती है, उम्मीद जाग उठती है कि शायद वही गया। भाव में बेचैनी, चाह और उम्मीद की तीखी धड़कन है।

राज़-ए-निहाँ ज़बान-ए-अग़्यार तक पहुँचा

क्या एक भी हमारा ख़त यार तक पहुँचा

Interpretation: Rekhta AI

इस दोहे में कड़वी विडंबना है: राज़ तो दूसरों में फैला नहीं, यानी बदनामी से बच गए, पर प्रेम का संदेश भी प्रिय तक नहीं पहुँचा। कवि “पहुंचना” शब्द से सुरक्षा और तड़प—दोनों को एक साथ दिखाता है। भाव यह है कि दूरी और किस्मत ने संवाद रोक दिया है।

बे-ख़ुद थे ग़श थे महव थे दुनिया का ग़म था

जीना विसाल में भी तो हिज्राँ से कम था

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर प्रेम की ऐसी तीव्र अवस्था दिखाता है जिसमें इंसान अपने-आप को भूलकर दुनिया की चिंताओं से कट जाता है। लेकिन विरोधाभास यह है कि प्रिय के मिल जाने पर भी मन की बेचैनी खत्म नहीं होती। मिलन के भीतर भी डर, अस्थिरता और अधूरापन बना रह सकता है। इसलिए यहाँ मिलन और वियोग—दोनों का दर्द लगभग बराबर बताया गया है।

ने जाए वाँ बने है ने बिन जाए चैन है

क्या कीजिए हमें तो है मुश्किल सभी तरह

Interpretation: Rekhta AI

कवि प्रेम की दुविधा में फँसा है: प्रिय के पास जाना भी ठीक नहीं पड़ता और दूर रहना भी बेचैनी देता है। “वहाँ” प्रिय की ओर/उपस्थिति का संकेत है और “चैन” मन की शांति का। दोनों रास्तों में पीड़ा होने से यह शेर बेबसी और तड़प को गहरा करता है।

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