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मिदहत से महक उठते थे गुलज़ार-ए-मदीना

मोहम्मद सलीम ताहिर

मिदहत से महक उठते थे गुलज़ार-ए-मदीना

मोहम्मद सलीम ताहिर

MORE BYमोहम्मद सलीम ताहिर

    मिदहत से महक उठते थे गुलज़ार-ए-मदीना

    मक्के से नज़र आते थे आसार-ए-मदीना

    चलता है तो फिर पीछे पलट कर नहीं तकता

    उड़ता ही चला जाता है रहवार-ए-मदीना

    ख़ुद अपने कमालात से मसहूर है हिजरत

    इक मरकज़ी किरदार है किरदार-ए-मदीना

    अंसार हुए कैसी स'आदत से सर-अफ़राज़

    कौनैन का सरदार है सरदार-ए-मदीना

    दुनिया में मसील उन का कोई और नहीं है

    दुनिया में नज़ीर अपनी हैं अंसार-ए-मदीना

    ज़ाइर को 'अता करते हैं ख़ुद इज़्न-ए-हुज़ूरी

    मेहमानों से ख़ुद मिलते हैं सरकार-ए-मदीना

    दुनिया में 'इलाज उस का कहीं और नहीं है

    रहता है मदीने में ही बीमार-ए-मदीना

    जो चाहे ख़रीदो यहाँ ता'अत के 'एवज़ तुम

    दिन रात खुला रहता है बाज़ार-ए-मदीना

    मक्के से निकलना पड़ा किस हाल-ए-ज़बूँ में

    दाख़िल हुए किस शान से सालार-ए-मदीना

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