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हरीफ़ों ने ख़िलाफ़ अपने बहुत खोला दहन अपना

बाबा जमाल बहराइची

हरीफ़ों ने ख़िलाफ़ अपने बहुत खोला दहन अपना

बाबा जमाल बहराइची

MORE BYबाबा जमाल बहराइची

    हरीफ़ों ने ख़िलाफ़ अपने बहुत खोला दहन अपना

    मोहब्बत की ज़बाँ फिर भी बना तर्ज़-ए-सुख़न अपना

    हमें ग़ैरों की कज-रफ़्तारियाँ किस राह से भाएँ

    हमारी चाल अपनी है हमारा है चलन अपना

    न-जाने किस हवा में है दिमाग़-ए-बाग़बाँ बरहम

    चमन अपना था और हो कर रहेगा फिर चमन अपना

    तुम अपने हो के भी अपनों का ग़म जब खा नहीं सकते

    किसी से और कह कर क्या करें रंज-ओ-मेहन अपना

    अरे तालिब-ए-गुल तुझ को अपने ज़ौक़ की सौगंद

    जुनूँ को देख पहले देखना फिर पैरहन अपना

    यहीं के गुल गले का हार हैं और हम-नशीं होंगे

    छूटा है छूटेगा चमन अपना वतन अपना

    'जमाल' इन हुस्न के मातों से इतना भी नहीं होता

    यगानों से अलग रक्खा करें बेगाना-पन अपना

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