मुस्तफ़ा की आमद है घर को जगमगाना है
मुस्तफ़ा की आमद है घर को जगमगाना है
हर तरफ़ विलादत की महफ़िलें सजाना है
आमद-ए-शह-ए-वाला सुन्नियो मुबारक हो
'इश्क़ में शह-ए-दीं के हर गली सजाना है
सरवर-ए-दो-'आलम की ख़ुश-नुमा विलादत पर
आशिक़ो तुम्हें घर के बाम-ओ-दर सजाना है
फूल मुस्कुराते हैं ख़ुशबूएँ लुटाते हैं
तितलियों के होंटों पर आप का तराना है
मस्जिदों में गलियों में गुलसिताँ में सहरा में
जश्न उन की आमद का हर जगह मनाना है
सुन्नियो चलो ले लो आशिक़ो चलो ले लो
रहमतों का बटने को आ गया ख़ज़ाना है
छा गई है तारीकी हर तरफ़ अँधेरा है
ज़िक्र से पयम्बर के ज़ुल्मतें मिटाना है
ज़िंदगी ख़ुदा रक्खे 'आशिक़ी ख़ुदा रक्खे
जश्न-ए-मुस्तफ़ा 'शाकिर' हर बरस मनाना है
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