हवा जब कभी साहिली गीत छेड़े हुए हो
मैं पत्तों को ताली बजाते हुए देखता हूँ
यहाँ अब शिव की महिमा कौन गाए
ये कलयुग है यहाँ रावन नहीं है
हज़ार ज़ाइक़ों के गीत गुनगुनाएँ बाग़ में
तिरे जमाल से लदे हुए मिरे दरख़्त हों
बचा सकेंगे न ये नग़्मा-हा-ए-चंग-ओ-रबाब
सिपर उठा कि तू मैदान-ए-कार-ज़ार में है