मुमताज़ अतहर
ग़ज़ल 4
अशआर 4
फ़क़त आँखें चराग़ों की तरह से जल रही हैं
किसी की दस्तरस में है कहाँ कोई सितारा
- अपने फ़ेवरेट में शामिल कीजिए
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
मिरे ख़िलाफ़ शहादत है मो'तबर सब की
मगर किसी से किसी का बयाँ नहीं मिलता
- अपने फ़ेवरेट में शामिल कीजिए
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
'अक्स रखता था न अपनी ज़ात में अपना कोई
कितने चेहरे आईनों के सामने रक्खे गए
- अपने फ़ेवरेट में शामिल कीजिए
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
मुझे दाएरों के हुजूम में कहीं भेज दे
मिरी वुसअतों को दवाम कर कफ़-ए-कूज़ा-गर
- अपने फ़ेवरेट में शामिल कीजिए
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए