तू जिस के दम पर भी बोलता है
मिरे ख़ुदा से बड़ा नहीं है
शुक्र शामिल न हो तो हर ने'मत
आदमी को क़लील लगती है
ज़िंदगी की मुश्किलें हैं इक तरफ़
इक तरफ़ पैग़ाम-ए-रब ला-तक़्नतू
मुझ को जीना वहाँ क़ुबूल नहीं
जिस जगह मिदहत-ए-रसूल नहीं
तुम आज तक नहीं समझे तो अब समझ जाओ
ज़मीं की बात नहीं थी ख़ुदा के नाम की थी
ज़र्रा ज़र्रा पुकारता है अहद
जब शहादत बिलाल देता है