नींद आ जाए तो फिर धूप न साया कोई
पाँव थक जाएँ तो परदेस भी घर लगता है
हम ही थे सख़्त-जाँ कि तिरे ग़म में जी लिए
हर हर नफ़स पे दिल ने ये आवाज़ दी कि बस
ख़्वाब आँखों से ज़बाँ से हर कहानी ले गया
मुख़्तसर ये है वो मेरी ज़िंदगानी ले गया
गुनाहगार सही फिर भी मेरे हिस्से का
तिरी तरफ़ जो निकलता है वो सवाब तो दे
तेरी ख़ातिर तिरा दिल रखने को मैं ने मिरे दोस्त
क़तरा-ए-ख़ूँ को जमाया जिगर ईजाद किया
ये किताबों सी जो हथेली है
सब से मुश्किल यही पहेली है
करिश्मा-साज़ी-ए-हुस्न-ए-अज़ल अरे तौबा
मिरा ही आईना मुझ को दिखा के लूट लिया
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टैग्ज़ : उर्दू ग़ज़लऔर 1 अन्य