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नई नस्ल के उभरते हुए शाइरों में शामिल

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मिराश

ग़ज़ल 8

अशआर 18

घर पलट कर जो मिरी रौशन-ख़याली आई है

शोर है शहर-ए-सुख़न में फिर दिवाली आई है

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जो मेरे बनने से पहले इक इंतिज़ार बना

उस इंतिज़ार के अंदर मैं बार बार बना

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इसी कफ़न से न ढक जाए सारा शहर कहीं

मिरा जनाज़ा परिंदे उठाए फिरते हैं

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गर्द आइनों की चारों तरफ़ है जमी हुई

'आलम 'अजीब शीशा-गरी की दुकान है

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संग पर संग रगड़ने से हुआ जो पैदा

उसी आहंग ने रक़्स-ए-शरर ईजाद किया

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