मीराजी की शख़्सियत और शायरी उर्दू अदब में हमेशा एक पुर-असरार (रहस्यमयी) और पेचीदा मौज़ू रही है। उनकी शायरी में कृष्ण, राधा, यशोदा, मंदिर, पुजारी, आरती और जमुना तट जैसे प्रतीकों के लगातार इस्तेमाल की वजह से अक्सर यह ग़लतफ़हमी पैदा हुई कि उन्होंने हिंदू धर्म से अपने जुड़ाव के कारण इज़हार (अभिव्यक्ति) का यह तरीक़ा अपनाया था। हालाँकि, शमीम हनफ़ी के विश्लेषण के मुताबिक़, मीराजी ने हिंदू दर्शन, ख़ास तौर पर वैष्णव मत के भक्ति विचार को मज़हबी अक़ीदे के बजाए एक 'रचनात्मक अक़ीदे' के तौर पर क़ुबूल किया था।
मीराजी स्वभाव से वैचारिक देवमाला के बजाए तजसीमी (मूर्त रूप वाली) देवमाला में दिलचस्पी रखते थे। चूँकि इस्लामी चिंतन बुनियादी तौर पर तजसीमी एहसास को नकारता है, इसलिए मीराजी ने अपनी अंदरूनी बेचैनी और मनोवैज्ञानिक तजुर्बों के इज़हार के लिए एक ऐसी सामूहिक देवमाला की तरफ़ क़दम बढ़ाया जो उनके हवास (इंद्रियों) में रच-बस गई थी। उन्होंने ख़ुद अपने अक़ीदे को स्पष्ट करते हुए कहा था कि यह बात ग़लत है कि उन्होंने इस्लाम को छोड़ा है, बल्कि वह एक ख़ुदा को अब भी मानते हैं, लेकिन उनकी शायरी का तरीक़ा मुजर्रद (अमूर्त) फ़िक्र के साथ ज़्यादा दूर तक नहीं जा सकता था।
मीराजी के माज़ी (अतीत) की कल्पना हाली की तरह किसी ख़ास तहज़ीबी-आमाल-नामे (सांस्कृतिक कर्म-पत्र) तक सीमित नहीं थी। वह अपने माज़ी को अपने जज़्बाती-नज़रिए (भावनात्मक दृष्टिकोण) से अलग नहीं कर सकते थे। उन्होंने अपने 'आर्य' होने का ज़िक्र किसी मज़हबी साझेदारी के जज़्बे की बुनियाद पर नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक विरासत के तौर पर किया। आर्यों की घुमक्कड़ी, बेसब्री, और अर्ज़ियत (सांसारिकता) में उलूहियत (दिव्यता) के निशानों की खोज मीराजी के लिए सिर्फ़ ऐतिहासिक घटनाएँ नहीं थीं, बल्कि उनकी अपनी रचनात्मक शख़्सियत की प्रेरक शक्तियाँ थीं।
चंडीदास पर अपने लेख में मीराजी ने लिखा था कि हिंदुस्तान अपनी पारंपरिक धीमी रफ़्तार और हिकायत-परस्ती (क़िस्सागोई) के साथ अब तक अपनी शुरुआती कल्पना का ही क़ैदी है और मा-बादत-तबीआत (तत्त्वमीमांसा) से उसका लगाव आज भी ज़ाहिर है। मीराजी ने इसी कल्पना को अपनी शायरी का कच्चा माल बनाया। कृष्ण के व्यक्तित्व में उन्हें अपने निजी संकट और नाकामियों की तसल्ली दिखाई दी, इसलिए भक्ति आंदोलन के वही हिस्से उन्हें प्रभावित कर सके जिनमें हक़ीक़त से ज़्यादा ज़ोर मजाज़ (रूपक) पर और रोशनी से ज़्यादा रंगों पर था।
मीराजी का यह सांस्कृतिक और जज़्बाती-निज़ाम (भावनात्मक व्यवस्था) उन्हें प्राचीन तांत्रिकों और आधुनिक दौर की 'बीट नस्ल' (Beat Generation) के अशांत नौजवानों के बीच एक पुल की तरह खड़ा कर देता है। उन्होंने इतिहास और तहज़ीब के उन युगों से एक विज्दानी (अंतर्ज्ञानी) रिश्ता जोड़ा जो समय के यांत्रिक विभाजन के कारण एक पुरानी दास्तान बन चुके थे। इस तरह उन्होंने चेतन स्तर पर अपने इज्तिमाई-ला-शुऊर (सामूहिक अवचेतन) को ज़िंदा रखा और उर्दू शायरी को एक ऐसी नई मज़हबियत से परिचित कराया जो मुनज़्ज़म-अक़ीदे (संगठित धार्मिक विश्वास) में अविश्वास के बा-वुजूद इंसान के बातिन (अंतर्मन) से गहरा ताल्लुक़ रखती है।
