किसी भी फ़न की तरह शायरी और ख़ास तौर पर ग़ज़ल के भी कुछ रचनात्मक क़ायदे, साँचे और भेद होते हैं। ग़ज़ल की तकनीक पर बात करना देखने में एक रूखा विषय मालूम हो सकता है, लेकिन अस्ल में यह ग़ज़ल की रूह तक पहुँचने का एक रास्ता है। फ़िराक़ गोरखपुरी के मुताबिक़, ग़ज़ल की तकनीक को दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है: ख़ारिजी (बाहरी) तकनीक और दाख़िली (भीतरी) तकनीक। ख़ारिजी तकनीक ग़ज़ल का वह ज़ाहिरी ढाँचा या 'ठुमरी' है जो बहर (छंद), क़ाफ़िया और रदीफ़ की पाबंदियों से बनी है। इसमें पहला शेर हम-क़ाफ़िया (एक जैसे तुक वाला) होता है और बाद के शेरों का दूसरा मिसरा (पंक्ति) उसी क़ाफ़िये की पैरवी (अनुसरण) करता है।
उर्दू ग़ज़ल के विकास के सफ़र में इसकी ख़ारिजी तकनीक या बुनियादी उसूलों में कोई ख़ास बदलाव या उतार-चढ़ाव नज़र नहीं आता। ग़ज़ल का ज़ाहिरी रूप-रंग सदियों से लगभग एक जैसा ही है। हालाँकि, अस्ल बदलाव ग़ज़ल के अर्थ, इसके विजदान (अनुभूति) और जमालियाती (सौंदर्यपरक) ख़यालों में ज़ाहिर होता है। यही वह मुक़ाम है जहाँ 'दाख़िली तकनीक' अपना जादू जगाती है। ग़ज़ल का हर बड़ा शायर महज़ अल्फ़ाज़ नहीं जोड़ता, बल्कि वह अपनी नग़्मा-सराई (काव्य-रचना) से एक ऐसी अनोखी और बे-मिसाल दुनिया तख़्लीक़ (रचना) करता है जिसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। नक़्ल करने वाले और कमज़ोर शायरों के यहाँ इसी दुनियाकी महज़ धुंधली परछाइयाँ नज़र आती हैं।
बाहरी तकनीक के दायरे में ग़ज़ल के कुछ तय-शुदा इशारे और अलामतें (प्रतीक) भी आती हैं, जैसे सहरा (रेगिस्तान), गुलिस्ताँ (बाग़), क़फ़स (पिंजरा), सय्याद (शिकारी), मय-ख़ाना, ज़ुल्फ़-ओ-रुख़ (बाल और चेहरा), और इश्क़-ए-हक़ीक़ी (ईश्वरीय प्रेम) और इश्क़-ए-मजाज़ी (सांसारिक प्रेम) के पड़ाव। लेकिन यह बाहरी तकनीक उस वक़्त तक बे-जान रहती है जब तक शायर का निजी विजदान (भीतरी अनुभूति) इसे बाहरी तकनीक में तब्दील न कर दे। एक ही बहर और क़ाफ़िये में कहे गए अशआर, शायर के भीतरी एहसास की बदौलत बिल्कुल अलग दुनियाएँ पेश कर सकते हैं। इसकी बेहतरीन मिसाल रिंद और सबा के अश'आर का तक़ाबुल (तुलना) है। रिंद ने अपने शेर में एक आम सा ख़याल पेश किया:
अगरी का है गुमाँ शक है मलागीरी का
रंग लाया है दुपट्टा तिरा मैला होकर
लेकिन जब सबा ने इसी ज़मीन, इसी बहर और इसी क़ाफ़िये को बरता, तो जज़्बात की तकनीक पूरी तरह बदल गई। सबा के यहाँ भीतरी एहसास ने शेर में ऐसी तहें और लहरें पैदा कर दीं कि अर्थ की दुनिया ही बदल गई:
बाग़बाँ, बुलबुल-ए-कुश्ता को कफ़न क्या देता
पैरहन गुल का यह बदला कभी मैला हो कर
इसी तरह, बाहरी तकनीक को भीतरी तकनीक किस तरह नया रूप देती है, इसका अंदाज़ा वज़ीर और ग़ालिब के शेरों से लगाया जा सकता है। वज़ीर का शेर हालाँकि तकनीकी लिहाज़ से दुरुस्त है, लेकिन इसमें तरन्नुम (लय) का वह बहाव नहीं जो एक आला ग़ज़ल का ख़ास्सा (विशेषता) होना चाहिए:
तिरछी नज़रों से न देखो आशिक़-ए-दिलगीर को
कैसे तीर-अंदाज़ हो सीधा तो कर लो तीर को
इसके उलट, जब ग़ालिब इसी बहर में (सिर्फ़ क़ाफ़िया और रदीफ़ के बदलाव के साथ) शेर कहते हैं, तो उनका भीतरी विजदान और एहसास की तकनीक (Technique of feeling) शेर को संगीत की देवी बना देती है:
सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं
ख़ाक में क्या सूरतें होंगी कि पिन्हाँ हो गईं
निचोड़ यह है कि ग़ज़ल में नयापन, नई झंकार और तरक़्क़ी, बाहरी उसूलों को तोड़ने से नहीं, बल्कि भीतरी एहसासात की गहराई से पैदा होती है। जैसा साज़ होता है, वैसा ही राग निकलता है। वली दकनी से लेकर मीर, ग़ालिब और बीसवीं सदी के शायरों तक, सबने ग़ज़ल की इसी भीतरी तकनीक को अपने-अपने मिज़ाज की थरथराहटों से मालामाल किया है।
