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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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नाज़ पर शेर

आइना देख के कहते हैं सँवरने वाले

आज बे-मौत मरेंगे मिरे मरने वाले

Interpretation: Rekhta AI

यह शेर अपनी ख़ूबसूरती/रुतबे पर तंज़ भरे घमंड का इज़हार है। बोलने वाला कहता है कि जो लोग उसे नुकसान पहुँचाना या मरता देखना चाहते हैं, वे ईर्ष्या और जलन में खुद ही भीतर से खत्म हो जाएँगे। “बे-मौत मरना” यहाँ असली मौत नहीं, बल्कि जलन से घुटने और हार मान लेने का रूपक है। भाव में चुनौती और कटाक्ष है।

दाग़ देहलवी

मरता तिरी कज-अदाइयों पर

लेकिन वो ख़ुमार उतर गया है

सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम

'रेहानी' उन को देख के महव-ए-ख़िराम-ए-नाज़

हर गाम पर बहार का धोका हुआ मुझे

हेंसन रेहानी

ग़ुरूर-ए-हुस्न का 'आलम तो देखिए 'राही'

किसी से बात भी करना है ना-गवार उन्हें

दिवाकर राही

ज़रा देख उस के नख़रे नहीं खाती दाल रोटी

मैं खिलाता उस को सदक़ा जो यहाँ मज़ार होता

हम्माद हसन

हश्र तक बे-गुनही नाज़ करेगी मुझ पर

वो मिरा तेरी निगाहों में बुरा हो जाना

शाज़ तमकनत

ज़ब्त-ए-ग़म वुफ़ूर-ए-शौक़ और दिल-ए-ना-सुबूर-ए-इश्क़

मुझ को तो है ग़ुरूर-ए-इश्क़ आप को नाज़ हो हो

हयात अमरोहवी

तुम्हारा लम्स मोअ'त्तर तुम्हारा जिस्म बहार

यही तो बहस गुलाबों के रू-ब-रू ठहरी

मीर नक़ी अली ख़ान साक़िब

नाज़ुकी क़ामत-ए-ज़ेबा की बयाँ क्या कीजे

पैरहन भी जहाँ उस्लूब-ए-नज़ाकत माँगे

इसहाक़ अतहर सिद्दीक़ी
बोलिए