मीर नक़ी अली ख़ान साक़िब
ग़ज़ल 15
अशआर 4
याद-ए-जानाँ उतर के आई है
शब के ज़ीने से चाँदनी की तरह
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
तुम्हारा लम्स मोअ'त्तर तुम्हारा जिस्म बहार
यही तो बहस गुलाबों के रू-ब-रू ठहरी
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
हर एक पल में हज़ारों ठहर गईं सदियाँ
नसीम-ए-सुब्ह-ए-तमन्ना मगर न तू ठहरी
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
दर-ए-फ़िराक़ पे दम-भर को निकहत-ए-सहरी
तिरे ख़िराम की मानिंद हू-ब-हू ठहरी
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए