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अफ़्सून-ए-ख़्वाब

प्रोफ़ेसर शोर

अफ़्सून-ए-ख़्वाब

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    उड़ रही हैं अज़-ज़मीं ता-आसमाँ

    दामन-ए-लैला-ए-शब की धज्जियाँ

    वक़्त के माथे पे है सदियों की धूल

    मल रहा है चाँद चेहरे पर भबूल

    बुझ रहे हैं नज्म-ओ-माह-ओ-कहकशाँ

    हो चुका गुल हर चराग़-ए-आसमाँ

    ऊँघते साए शजर सोए हुए

    क़स्र सोए बाम-ओ-दर सोए हुए

    'अर्श-ओ-फ़र्श-ओ-बहर-ओ-बर हैं महव-ए-ख़्वाब

    मौत है 'उम्र-ए-रवाँ के हम-रिकाब

    जल्वा-गाहों में तरब ख़ानों में नींद

    महफ़िलों में नींद ऐवानों में नींद

    कूचा-ओ-बाज़ार साकित हो गए

    बहर के सीने में तूफ़ाँ खो गए

    दजला-ए-तहज़ीब में तूफ़ाँ नहीं

    'अक़्ल के फ़ित्ने बला-ए-जाँ नहीं

    होश के दोज़ख़ का लावा सर्द है

    मतला’-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र बे-गर्द है

    कर के पिंहाँ आस्तीनों में सनम

    सो गए कितने यहूदान-ए-हरम

    वो भी ज़ंगी सो रहे हैं रात में

    हैं ख़जिल आईने जिन के हात में

    रख दिया है ऐसे बहरों ने भी साज़

    जो भरे मजमों' में हों नग़्मा-तराज़

    हो चुके वो कोर भी मसरूफ़-ए-ख़्वाब

    जिन की नज़रों से हैं लर्ज़ां आफ़्ताब

    हो के तन्क़ीदों के छज्जों पर सवार

    फ़िक्र के बौने नहीं मसरूफ़-ए-कार

    खा चुके हैं रात के तरकश का तीर

    शहर भर के ग़ालिब-ओ-हाली-ओ-मीर

    सैद भी हैं दाम में सय्याद भी

    हज़रत-ए-फ़न-कार भी नक़्क़ाद भी

    कर के पूरा अपना अपना बेव्पार

    सो रहे हैं फ़िक्र-ओ-फ़न के सूद-ख़्वार

    रख के सौ नश्तर रग-ए-जाँ के क़रीब

    जा चुके घर क़हवा-ख़ानों के अदीब

    बिक चुकी तन्क़ीद की जिंस-ए-गिराँ

    बंद है शे'र-ओ-अदब की हर दुकाँ

    हो चुका फ़िक्र-ओ-नज़र का मोल-तोल

    चढ़ चुका सूरज पे तारीकी का ख़ोल

    जहल के नश्तर न दानिश का गज़ंद

    सो रहे हैं कैसे कैसे हल्क़ा-बंद

    वो भी महव-ए-ख़्वाब हैं 'आली-मक़ाम

    जिन की पेशानी पे लिक्खा है ग़ुलाम

    बा-वुजूद-ए-मंसब-ओ-तमकीन-ओ-जाह

    जिन का क़ामत नाप लेती है निगाह

    उन की गर्दन में भी है शब की तनाब

    ख़ून-ए-फ़न्न-ओ-फ़िक्र है जिन की शराब

    चादरें ताने हैं वो भी सूद-ख़्वार

    बंदगी भी जिन की है यज़्दाँ-शिकार

    उन के महलों पर भी है शब की कमंद

    चल के लाशों पर जो होते हैं बुलंद

    सुब्ह की किरनों से भर कर अपना जेब

    ले रहा है दम अँधेरे का फ़रेब

    भूक भी ख़्वाबीदा है इफ़्लास भी

    फ़िक्र भी सोई है और एहसास भी

    बिस भरी कोई हँसी हँसता नहीं

    आदमी को आदमी डसता नहीं

    अब किसी चेहरे पे 'अय्यारी नहीं

    अब कोई आईना ज़ंगारी नहीं

    यूँ सुकूत-ए-शब में होता है गुमाँ

    जैसे साकित हो गई 'उम्र-ए-रवाँ

    ख़्वाब का मरहम है ज़ख़्म-ए-ज़ीस्त पर

    सी रही है रात हर ज़ख़्म-ए-जिगर

    रात कहती है मिरा इक जाम पी

    सी सके तो ज़ख़्म-ए-दिल का चाक सी

    जागते ही जागते सो जाऊँ मैं

    एक शहर-ए-ख़्वाब में खो जाऊँ मैं

    मुझ को रह रह कर मगर होता है ग़म

    कल ये फ़ित्ने जाग उठेंगे सुब्ह-दम

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