हर तरफ़ धूम उन की मची है हर तरफ़ ज़िक्र-ए-सल्ल-ए-'अला है
हर तरफ़ धूम उन की मची है हर तरफ़ ज़िक्र-ए-सल्ल-ए-'अला है
शाकिर रज़ा बदायुनी
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हर तरफ़ धूम उन की मची है हर तरफ़ ज़िक्र-ए-सल्ले-'अला है
कौन पर्दे से आया है बाहर नूर किस का ये फैला हुआ है
शान जिस की ख़ुदा ने बढ़ाई 'अर्श पर जिस की मसनद सजाई
जिस के हाथों में सारी ख़ुदाई वो नबी आज पैदा हुआ है
हूर-ओ-ग़िल्माँ ने नग़्मे सुनाए चाँद तारों ने भी गीत गाए
ले के पैग़ाम जिबरील आए आज महबूब-ए-रब आ गया है
किस के जल्वों से 'आलम है रौशन किस की निकहत से महका है गुलशन
किस की ख़ुशबू बसी है गुलों में नूर किस का चमन को मिला है
मर्हबा मर्हबा के ये ना'रे आज 'आशिक़ लगाएँगे सारे
जगमगा कर ये कहते हैं तारे जान-ओ-दिल मुस्तफ़ा पर फ़िदा है
दस्त-बस्ता फ़रिश्ते खड़े हैं लब पे आमद के नग़्मे सजे हैं
बे-कसों की हिमायत की ख़ातिर आज शाह-ए-'अरब आ रहा है
जिस को कहते हैं वहदत का दर्पन हुस्न जिस का है 'आलम में रौशन
उस के तलवों का मिल जाए धोवन सारी उम्मत का जो पेशवा है
आसमानों की 'अज़्मत बढ़ा कर सर पे ताज-ए-शफ़ा'अत सजा कर
वस्ल-ओ-फुर्क़त के पर्दे उठा कर कौन क़स्र-ए-दना तक गया है
शान-ए-वहदत का पैग़ाम 'शाकिर' हम को देता है क़ुरआन 'शाकिर'
अहल-ए-उल्फ़त को ईमान 'शाकिर' मुस्तफ़ा की बदौलत मिला है
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