बुलंदी दे के ख़ुद को फिर ख़ुदी को ख़्वार करना
बुलंदी दे के ख़ुद को फिर ख़ुदी को ख़्वार करना
बशर को बस यही तो आता है हर बार करना
मुझे मिट्टी बना देना कभी फ़ुर्सत मिले तो
उसी से फिर कई शा'इर नए तय्यार करना
खुला ही कब तुम्हारा दर किसी की दस्तकों पर
तुम्हीं से मैं ने सीखा है मगर इसरार करना
बहुत से तीर मुझ पर हैं ज़माने ने चलाए
हुनर बस आप में था सीने के उस पार करना
हमें मा'लूम हैं ज़ख़्मों के मरहम भी मगर हम
यही तरकीब रखते हैं कि उन पर वार करना
अगर मिल जाए वो 'आनन' तो क़िस्सा ख़त्म ही है
इसी में ख़ैर है बस दूर से दीदार करना
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.