Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर

उर्दू शायरी पर स्कॉलर

रचनात्मक ज़बान के तत्व: तश्बीह, इस्तिआरा और पैकर की समझ

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी की आलोचनात्मक समझ की रोशनी में रचनात्मक ज़बान के बुनियादी तत्वों, तश्बीह, इस्तिआरा और पैकर, का विश्लेषण और उनकी समझ।

इक़बाल की शायरी का सौतियाती (ध्वन्यात्मक) तिलिस्म: सफ़ीरी और मुसलसल आवाज़ों का कमाल

यह लेख अल्लामा इक़बाल की शायरी में ध्वन्यात्मक लय, ख़ास तौर पर सफ़ीरी (Sibilants) और मुसलसल (Continuants) आवाज़ों के बहुत ज़्यादा इस्तेमाल और उनसे पैदा होने वाले माहौल का विश्लेषण करता है।

इक़बाल की शायरी का मिज़ाज और हकार (Aspirated) व माकूसी (Retroflex) आवाज़ों से परहेज़

इस मज़मून (लेख) में इस बात का जायज़ा लिया गया है कि अल्लामा इक़बाल ने अपनी शायरी में उर्दू की भारी-भरकम हकार (Aspirated) और माकूसी (Retroflex) आवाज़ों का इस्तेमाल कितना कम किया है और इससे उनके शायरी के अंदाज़ पर क्या असर पड़ा है।

तख़य्युल (कल्पना) का जादू और मिर्ज़ा ग़ालिब का कलाम

तख़य्युल (कल्पना) सिर्फ़ ख़यालों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अल्फ़ाज़ और मालूमात (जानकारी) को एक नई और हैरत-अंगेज़ तरतीब देकर पेश करता है, जिसकी बेहतरीन मिसालें मिर्ज़ा ग़ालिब के कलाम में मिलती हैं।

लफ़्ज़ और नग़्मा: कलाम में फ़साहत और अल्फ़ाज़ की तरतीब का राज़

फ़साहत सिर्फ़ अलग-अलग अल्फ़ाज़ की ख़ूबसूरती का नाम नहीं है, बल्कि यह अल्फ़ाज़ की आवाज़ और अर्थ के उस तालमेल का नाम है जो कलाम को एक दिलकश नग़्मा बना देता है।

मीर तक़ी मीर: दुनिया से बेज़ार या ज़िंदगी की नब्ज़ पहचानने वाले?

मुहम्मद हुसैन आज़ाद की फैलाई हुई इस ग़लतफ़हमी को दूर करना कि मीर तक़ी मीर दुनिया से बेज़ार और अलग-थलग रहने वाले शायर थे, और उनके कलाम की रोशनी में समाज से उनके जुड़ाव का सुबूत।

रात, तन्हाई और चाँदनी: फ़ैज़ की शायरी का बुनियादी जमालियाती (सौंदर्यवादी) मूड

यह लेख फ़ैज़ की शायरी में रात, चाँदनी और तन्हाई के चित्रण का विश्लेषण करता है, जो उनके कलाम में एक ख़ास और गहरा सौंदर्यवादी माहौल पैदा करता है।

ग़ज़ल: ज़ात और कायनात का ख़ूबसूरत संगम

ग़ज़ल सिर्फ़ शायरी की एक विधा नहीं है, बल्कि ज़ात (स्वयं) के ज़रिए पूरी कायनात को समेटने वाली इशारों की एक ऐसी कला है, जो बड़ी-बड़ी दास्तानों को दो मिसरों (पंक्तियों) में बयान कर देती है।

मीर तक़ी मीर और रोज़मर्रा की ज़बान का रचनात्मक कमाल

मीर तक़ी मीर का सबसे बड़ा कारनामा यह है कि उन्होंने आम बोल-चाल और रोज़मर्रा की ज़बान को इस्तिआरे (रूपक) और रिआयत (शब्दों के तालमेल) के ज़रिए महान शायरी की ज़बान में बदल दिया।

'ख़ुदा-ए-सुख़न' का अस्ल मतलब: मीर तक़ी मीर ही शायरी के ख़ुदा क्यों हैं?

मीर तक़ी मीर को 'ख़ुदा-ए-सुख़न' क्यों कहा जाता है? यह ख़िताब महज़ एक तारीफ़ नहीं है, बल्कि शायरी की तमाम अस्नाफ़ (विधाओं ) पर मीर की मुकम्मल महारत का सुबूत है।

अश्लीलता और बराज़ियात: चिरकीन की शायरी को समझने का नया नज़रिया

शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी ने चिरकीन की शायरी पर लगे 'अश्लीलता' के इल्ज़ाम का आलोचनात्मक जायज़ा लेते हुए 'अश्लीलता' (Pornography) और 'बराज़ियात' (Scatology) के बीच साफ़ फ़र्क़ क़ायम किया है।

बोलिए