अदबी तनक़ीद (साहित्यिक आलोचना) में इस्तिआरा (Metaphor) और अलामत (Symbol) को अक्सर मिला दिया जाता है, लेकिन शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी इन दोनों के बीच एक बहुत साफ़ और मंतक़ी (तार्किक) फ़र्क़ की लकीर खींचते हैं। अरस्तू से लेकर नए अमेरिकी नक़्क़ादों (आलोचकों) तक, इस्तिआरे की बुनियादी तारीफ़ यही रही है कि यह दो अलग-अलग चीज़ों में समानता खोजने का नाम है, शर्त यह है कि समानता की वजह को लफ़्ज़ों में साफ़ तौर पर न बताया जाए। इस्तिआरे की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि यह अस्ल में 'मुशाहिदे' (Observation) पर आधारित होता है, 'इल्म' (Knowledge) पर नहीं।
इस बात को समझने के लिए एक सादा सी मिसाल लीजिए। जब हम कहते हैं 'ज़ैद शेर है', तो यह एक इस्तिआरा है। इस इस्तिआरे की बुनियाद इस मुशाहिदे पर है कि शेर बहादुर, ताक़त-वर, और फुर्तीला होता है, और ज़ैद में भी ये ख़ूबियाँ पाई जाती हैं। हमने शेर और ज़ैद का मुशाहिदा किया और उनकी साझा ख़ूबियों की बुनियाद पर एक को दूसरे का इस्तिआरा बना दिया। इस्तिआरा मुशाहिदे की अलग-अलग इकाइयों को एक ही रूप में मिला देता है।
इसके उलट, 'अलामत' सीधे तौर पर मुशाहिदे को नकारती है। अलामत उस इल्म का इज़हार है जो मुशाहिदे की ज़ाहिरी सतह से कहीं गहरा होता है। फ़ारूक़ी साहब इसे समझाने के लिए विलियम ब्लेक की मशहूर नज़्म 'The Tiger' की मिसाल देते हैं, जिसमें ब्लेक चीते को 'Burning Bright' (रोशन और दहकता हुआ) कहता है। अगर हम सिर्फ़ मुशाहिदे की बात करें तो चीते की धारियाँ उसे जंगल के साये में छुपने में मदद देती हैं, वो कोई दहकती हुई या रोशन चीज़ नहीं होतीं। न ही चीता हक़ीक़त में आग में जल रहा होता है।
लेकिन ब्लेक ने यहाँ चीते को एक अलामत के तौर पर इस्तेमाल किया है। 'Burning Bright' के लफ़्ज़ एक ही वक़्त में रोशनी, आग, गर्मी, आँखों की चमक, ताक़त, दबदबे और तेज़ी के उस 'इल्म' को ज़ाहिर करते हैं जो शायर के ज़ेहन में चीते को लेकर मौजूद है। जिस लम्हे आप इस अलामत को सिर्फ़ ज़ाहिरी मुशाहिदे की कसौटी पर परखने की कोशिश करेंगे, उसके सारे अलामती मानी ख़त्म हो जाएँगे और वह एक मामूली इस्तिआरा बनकर रह जाएगा।
अलामत की एक और बड़ी पहचान उसकी 'नीम-रोशनी' (Half-light) और उसके कई मानी होना है। इस्तिआरे के मानी आमतौर पर तय किए जा सकते हैं, लेकिन अलामत की पक्की हदें और मानों की सरहदें आसानी से साफ़ नहीं की जा सकतीं। अलामत एक ही वक़्त में आम भी होती है और ख़ास भी। यह एक ऐसी छवि (Image) है जिसका तर्जुमा उसी ज़बान के दूसरे लफ़्ज़ों में बिना मानी को नुक़सान पहुँचाए मुमकिन नहीं होता। अलामत अपने अंदर एक ऐसा बहुअर्थी गुण रखती है जिसका तर्जुमा नहीं किया जा सकता, और यही बात उसे इस्तिआरे से अलग और बेहतर बनाती है।
