उर्दू शायरी की दुनिया में मीर तक़ी मीर को 'ख़ुदा-ए-सुख़न' (शायरी का ख़ुदा) कहा जाता है। लेकिन अक्सर लोग इस ख़िताब का अस्ल मतलब समझे बिना इसका इस्तेमाल करते हैं। जो लोग मीर को ग़ालिब से बड़ा साबित करना चाहते हैं, वे इसे एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। वहीं, ग़ालिब के समर्थक यह कहकर इसे ख़ारिज कर देते हैं कि 'ख़ुदा-ए-सुख़न' तो मिर्ज़ा औज (जो एक मामूली शायर थे) को भी कहा जाता था। शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी के अनुसार, ये दोनों ही तर्क ग़लत हैं। इस ख़िताब का सही अर्थ हमारी शायरी की परंपरा और इतिहास की रोशनी में ही तय हो सकता है।
फ़ारसी और उर्दू शायरी की रिवायत में किसी को 'ख़ुदा' या 'पैग़ंबर' कहने का मतलब यह नहीं होता कि वह सबसे बड़ा या सबसे अच्छा शायर है। इसका मतलब यह होता है कि उस शायर ने शायरी की कई अस्नाफ़ (विधाओं) की बुनियाद रखी, उन्हें स्थापित किया और उनमें महारत हासिल की। मीर का एक मशहूर और बदनाम कथन है कि 'इस वक़्त शायर सिर्फ़ ढाई हैं, एक तो ख़ुद मैं, एक मिर्ज़ा रफ़ी (सौदा) और आधे ख़्वाजा मीर दर्द।' मीर ने दर्द को 'आधा शायर' इसलिए नहीं कहा कि वे ख़राब शायर थे, बल्कि इसलिए कहा क्योंकि दर्द सिर्फ़ ग़ज़ल कहते थे। मीर के नज़दीक मुकम्मल शायर वह था जो ग़ज़ल के साथ-साथ क़सीदा और मसनवी में भी महारत रखता हो।
मीर ने ख़ुद को मुकम्मल शायर साबित किया। उन्होंने सिर्फ़ ग़ज़लें नहीं कहीं, बल्कि क़सीदा, मसनवी, मर्सिया, रुबाई, शहर-आशोब, वासोख़्त और हज्व (निंदा-काव्य) जैसी लगभग आठ विधाओं में बेहतरीन कलाम छोड़ा। वासोख़्त का तो आविष्कार ही मीर के ही सिर बाँधा जाता है। इसके बरअक्स (विपरीत), मिर्ज़ा ग़ालिब ने उर्दू में मुख्य रूप से सिर्फ़ ग़ज़ल, क़सीदा और रुबाई ही कही। ग़ालिब ने मसनवी और मर्सिये के मैदान में उर्दू में कोई ख़ास क़दम नहीं रखा।
मीर का यह क़ितआ उनकी इसी सोच को ज़ाहिर करता है:
क्या रहा है मुशायरे में अब
लोग कुछ जम' आन होते हैं
मीर-ओ-मिर्ज़ा-रफ़ी-ओ-ख़्वाजा-मीर
कितने इक ये जवान होते हैं
मीर ने अपनी ज़िंदगी में जो अनगिनत उतार-चढ़ाव देखे, जंगें, ग़रीबी, दरबदरी, सूफ़ियों और सिपाहियों की सोहबत। वह सब उनकी शायरी की अलग-अलग विधाओं में ढल गया। उन्होंने हर रंग को अपनाया। इसलिए, एक ऐसा शायर जो अपने दौर का सबसे मुमताज़ शायर हो, जिसने शायरी की हर सिन्फ़ (विधा) में भारी मात्रा में और बेहतरीन काम किया हो, और जिसने नई विधाएँ ईजाद की हों, उसे अगर 'ख़ुदा-ए-सुख़न' कहा जाए, तो यह बिल्कुल सही और हक़-ब-जानिब है। ग़ालिब यक़ीनन बहुत महान हैं, लेकिन विधाओं की इस कसरत और महारत के पैमाने पर 'ख़ुदा-ए-सुख़न' का ताज मीर के ही सिर सजता है।
