ग़ालिब और मीर: ज़ेहनी बनावट और रचनात्मक उपयोग का रिश्ता
ग़ालिब ने मीर से जो प्रेरणा ली, वह महज़ तक़लीद (नक़्ल) नहीं थी, बल्कि यह दोनों अज़ीम शायरों की ज़ेहनी बनावट और सोचने के अंदाज़ की गहरी समानता का सुबूत है।
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
ग़ालिब ने मीर से जो प्रेरणा ली, वह महज़ तक़लीद (नक़्ल) नहीं थी, बल्कि यह दोनों अज़ीम शायरों की ज़ेहनी बनावट और सोचने के अंदाज़ की गहरी समानता का सुबूत है।
ग़ज़ल की शेरियात (काव्य-शास्त्र) में 'कैफ़ियत' तुरंत जज़्बाती असर पैदा करती है जबकि 'मानी-आफ़रीनी' फ़िक्री गहराई को दर्शाती है, और इन दोनों का संतुलन ही बड़े शायर की पहचान है।