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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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मज़मून-आफ़रीनी पर स्कॉलर

क्लासिकी ग़ज़ल: आपबीती नहीं, मज़मून-आफ़रीनी की दुनिया

ग़ज़ल में शायरों के ख़ास मज़मून (जैसे ग़ालिब का रश्क या मीर की ख़ुद्दारी) उनकी निजी विशेषताएँ नहीं बल्कि कलात्मक मज़मून-आफ़रीनी (विषय-रचना) का हिस्सा होते हैं।

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