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पाकिस्तान के चर्चित शायर। अपनी ग़ज़ल ' मैं ख़याल हूँ किसी और का ' के लिए मशहूर।

पाकिस्तान के चर्चित शायर। अपनी ग़ज़ल ' मैं ख़याल हूँ किसी और का ' के लिए मशहूर।

सलीम कौसर की टॉप 20 शायरी

क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं

कितनी आज़ादी से हम अपनी हदों में क़ैद हैं

कहानी लिखते हुए दास्ताँ सुनाते हुए

वो सो गया है मुझे ख़्वाब से जगाते हुए

और इस से पहले कि साबित हो जुर्म-ए-ख़ामोशी

हम अपनी राय का इज़हार करना चाहते हैं

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है

सर-ए-आईना मिरा अक्स है पस-ए-आईना कोई और है

हम ने तो ख़ुद से इंतिक़ाम लिया

तुम ने क्या सोच कर मोहब्बत की

आईना ख़ुद भी सँवरता था हमारी ख़ातिर

हम तिरे वास्ते तय्यार हुआ करते थे

मुझे सँभालने में इतनी एहतियात न कर

बिखर न जाऊँ कहीं मैं तिरी हिफ़ाज़त में

पुकारते हैं उन्हें साहिलों के सन्नाटे

जो लोग डूब गए कश्तियाँ बनाते हुए

तुम ने सच बोलने की जुरअत की

ये भी तौहीन है अदालत की

बहुत दिनों में कहीं हिज्र-ए-माह-ओ-साल के बाद

रुका हुआ है ज़माना तिरे विसाल के बाद

ऐ मिरे चारागर तिरे बस में नहीं मोआमला

सूरत-ए-हाल के लिए वाक़िफ़-ए-हाल चाहिए

ख़ामोश सही मरकज़ी किरदार तो हम थे

फिर कैसे भला तेरी कहानी से निकलते

तुम तो कहते थे कि सब क़ैदी रिहाई पा गए

फिर पस-ए-दीवार-ए-ज़िंदाँ रात-भर रोता है कौन

मिरी रौशनी तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर

तू क़रीब आ तुझे देख लूँ तू वही है या कोई और है

याद का ज़ख़्म भी हम तुझ को नहीं दे सकते

देख किस आलम-ए-ग़ुर्बत में मिले हैं तुझ से

ज़ोरों पे 'सलीम' अब के है नफ़रत का बहाव

जो बच के निकल आएगा तैराक वही है

जुदाई भी न होती ज़िंदगी भी सहल हो जाती

जो हम इक दूसरे से मसअला तब्दील कर लेते

साए गली में जागते रहते हैं रात भर

तन्हाइयों की ओट से झाँका न कर मुझे

अहल-ए-ख़िरद को आज भी अपने यक़ीन के लिए

जिस की मिसाल ही नहीं उस की मिसाल चाहिए

ये आग लगने से पहले की बाज़-गश्त है जो

बुझाने वालों को अब तक धुआँ बुलाता है

कभी लौट आएँ तो पूछना नहीं देखना उन्हें ग़ौर से

जिन्हें रास्ते में ख़बर हुई कि ये रास्ता कोई और है

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