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तुम नहीं समझोगे

सलमान सरवत

तुम नहीं समझोगे

सलमान सरवत

MORE BYसलमान सरवत

    बे-तलब मंज़िलें

    बे-इरादा सफ़र

    इक मसाफ़त है जो इब्तिदा से परे

    इंतिहा से अलग

    वक़्त से मावरा

    अपनी आवारगी का कोई सबब है कोई सिरा

    एक ख़ुद-रौ उदासी

    मलामत-ज़दा आरज़ू की नुमू

    झिलमिलाते दुखों की वो बहती हुई आबजू

    हसरतों का ये बे-रब्त जुग़राफ़िया

    जान-लेवा ख़यालों की आमाज-गाह

    अपने ख़्वाबों में इन के सिवा और रक्खा है क्या

    चिलचिलाती थकन

    चिरमिराता बदन

    मोम सूरत टपकते पसीने की बूँदें

    तनफ़्फ़ुस का मद्द-ओ-जज़र

    अन-किए फ़ैसलों का ज़रर इस क़दर

    इस क़दर शौक़-ए-आवारगी किस लिए

    किस लिए एक बे-नाम जज़्बे के इसरार पर

    ज़िंदगी महज़ ख़ुद-कार ज़ीने के मानिंद चलती रही

    हाशिए पे किनारा-कशी कैसे मुमकिन हुई

    दायरा-वार चलने की 'आदत कहाँ से पड़ी

    कोई मेहवर नहीं और बला की कशिश

    कुछ कुछ भेद है बर-सबील-ए-ख़लिश

    मैं समझ जाऊँगा

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