ग़ैरों के लिए क्यूँ हमें नाशाद करें आप
ग़ैरों के लिए क्यूँ हमें नाशाद करें आप
अगली जो मोहब्बत थी उसे याद करें आप
आँखों की सना में ग़ज़ल इक मैं ने कही है
लाज़िम है कि हर शे'र पे दो साद करें आप
ठोकर ही से क्या ख़ाक हो ज़िंदा मिरा मुर्दा
क़ुम अपनी ज़बाँ से भी तो इरशाद करें आप
सह सह के सितम हो गए मश्शाक़ बहुत हम
जब जानें कि कोई सितम ईजाद करें आप
ऐसी पुर-असर थीं मिरी आहें शब-ए-फ़ुर्क़त
दिल थाम लें हाथों से जो फिर याद करें आप
ऐ यार अभी हौसला है चर्ख़ का बाक़ी
वो ज़ुल्म से नादिम हो तो बे-दाद करें आप
ऐ हज़रत-ए-दिल हो गए क्यूँ शेफ़्ता-ए-हुस्न
साथ अपने न मुझ को कहीं बर्बाद करें आप
इस वास्ते सहता हूँ मैं ऐ यार जफ़ाएँ
कुछ दिन तो पस-ए-मर्ग मुझे याद करें आप
ये ज़ब्त-ए-मोहब्बत की है ताकीद शब-ए-हिज्र
दम घुट के भी निकले तो न फ़रियाद करें आप
दामन वो झटकते हैं तो कहती है मिरी ख़ाक
बर्बाद हूँ ख़ुद मुझ को न बर्बाद करें आप
कम की सिफ़त-ए-हुस्न जो मैं ने तो वो बोले
अब ढूँढ के मा'शूक़ परी-ज़ाद करें आप
मक़्तल में अगर पाँव से ग़ैर आए तो क्या फ़ख़्र
मैं सर के बल आऊँ जो मुझे याद करें आप
ऐ तू सही उस नाला-ए-पुर-दर्द से हो मोम
दिल अपना मिरी सम्त से फ़ौलाद करें आप
हसरत न ये रह जाए हुज़ूर आप के दिल में
राज़ी हूँ मैं बे-दाद पे बे-दाद करें आप
क्या लुत्फ़ उजाड़ा अगर आबाद दिलों को
वीरान हैं जो दिल उन्हें आबाद करें आप
सब उन के सितम सह लिए हम ने तो ये बोले
अब ज़ुल्म करूँ वो कि बहुत याद करें आप
याँ तो कमर उन की नहीं मिलने की 'फ़साहत'
क़स्द अब सू-ए-शहर-ए-‘अदम-आबाद करें आप
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