उस दरीचे पर नज़र है और तपती दोपहर
उस दरीचे पर नज़र है और तपती दोपहर
फिर सफ़र अन्दर सफ़र है और तपती दोपहर
इम्तिहान-ए-उस्तुवारी की दरख़्शानी तो देख
एक हब्शी रेत पर है और तपती दोपहर
एक ख़ामोशी पे दुनिया भर की आसाइश उधर
और इधर नेज़े पे सर है और तपती दोपहर
इक तिलिस्म-ए-ख़्वाब-ए-ख़ुश-आसार है तेरा विसाल
हम हैं हिजरत का नगर है और तपती दोपहर
मैं झुलस जाऊँ न 'क़ासिम' सोचते ही सोचते
इक तिलिस्म-ए-ख़ैर-ओ-शर है और तपती दोपहर
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