वहाँ की रेत से भी रौशनी निकलती है
वहाँ की रेत से भी रौशनी निकलती है
ख़ुदी को लेने जहाँ बे-ख़ुदी निकलती है
धमाल करता हूँ उस को तलाशता हूँ मैं
मिरी तलाश में जब आगही निकलती है
ये कैसा तुझ से त'अल्लुक़ जुड़ा मिरे हमदम
करूँ न याद अगर जाँ मिरी निकलती है
सुख़न के फूल महकते हैं बज़्म-ए-जानाँ में
हमारे शे'र से जब ताज़गी निकलती है
हमारे बच्चों के चेहरे उतरने लगते हैं
हमारी जेब से जब ख़ामुशी निकलती है
'अबस ख़याल ही बनते नहीं ये अहल-ए-सुख़न
क़लम की नोक से इक रौशनी निकलती है
जहाँ पे 'इश्क़ की बाज़ी मैं हार जाता हूँ
मनाने जश्न वहाँ बेबसी निकलती है
हमारे शे'र को सादा समझ रहे हैं वो
हमारी बात मगर मंतिक़ी निकलती है
हमारे पर्स में सिक्के फ़क़त ख़यालों के
हमारी जेब से भी शा'इरी निकलती है
मिलें जो मंज़िलें यूँ कारवान-ए-चाहत की
फ़रेब दे के हमें ज़िंदगी निकलती है
ग़रीब-ए-शहर तो तन्हा कभी नहीं रोता
गले लगाने उसे मुफ़लिसी निकलती है
समुंदरों की कहानी बहुत सुनी मैं ने
मुझे पता है कहाँ जल-परी निकलती है
हमारे लहजे में हो बात तो 'बशर' साहब
दुखों के देस में बन कर ख़ुशी निकलती है
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